Wednesday, March 22, 2023

सर.... आपने हमें समझाये 'गुरु ' होने के मायने





  ‘सर को क्या हो गया था।

किसे

पीपी सर को

क्या हो गया सर को

तुमने देखा नहीं, व्हाट्सएप पर खबर चल रही है कि सर की डेथ हो गई है।

क्या, क्या बोल रहे हो। कैसे, कब। ऐसा कैसे हो गया।

उस दिन सुबह जब मेरे मित्र  मुकेश तिवारी ने फोन कर यह हृदयविदारक खबर दी, तो पहले तो इस पर यकीन ही नहीं हुआ और जब अहसास हुआ कि यह झूठ नहीं है, तो ऐसा लगा कि सारी दुनिया ही उजड़ गई हो।

सर के जाने के बाद, मैंने अपने जीवन में पहली बार यह महसूस किया कि किसी अपने के चले जाने का दुख क्या होता है। सर को गए आज 15 दिन से अधिक हो गए हैं, लेकिन उनका चेहरा, उनके साथ गुजारा गया वक्त, उनके जीवन से जुड़े पहलू अक्सर याद आते रहते हैं

सर और मैं दोनों एक ही शहर में थे। फिर भी उनसे कई बार हफ्तों या महीनों में बात हो पाती थी, लेकिन ऐसा लगता था कि वो मेरे बहुत करीब हैं, आसपास ही हैं। उनका इस दुनिया में होना ही, मुझे और शायद उनके कई छात्र-छात्राओं को एक निश्चिंतता का भाव देता था। निश्चिंतता इस बात की कि कभी भी जिंदगी में कोई मुश्किल आ जाए और भले ही उस मुश्किल से निपटने के लिए भले ही हमारे सारे अस्त्र-शस्त्र खराब हो जाएँ, लेकिन एक सर हैं, जो हमारी मदद के लिए हमेशा खड़े रहेंगे। मैं, आपको अपना एक किस्सा बताता हूं। कुछ साल पहले किसी वजह से मैं बहुत परेशान था उस वक़्त मैं सर को अक्सर फोन लगा दिया करता था, लेकिन अपनी तमाम व्यस्तताओं के बावजूद कभी सर झल्लाए नहीं, चिढ़े नहीं। तमाम सारी बातें करने के बाद कहते थे, तुम चिंता मत करो, अपन कुछ करते हैं। ऐसे ही एक दिन मैंने उन्हें फोन किया। उन्हें ऐसा लगा होगा कि मैं ज्यादा परेशान हूं, तो तुरंत कहा-एक काम करो घर आ जाओ, घर पर बात करते हैं। मैं ऑफिस का काम निपटाकर रात करीब 11 बजे उनके घर पहुंचा। मुझसे बात की, मुझे समझाया। मेरा मन हल्का करने के लिए कुछ हंसी मजाक की बात भी कीं और फिर अपने पिताजी से भी कहा, आप इसे जरा मोटिवेट करो। सर के सानिध्य ने मेरे घावों के लिए मरहम का काम किया। परेशानी तत्काल दूर नहीं हुई, लेकिन मेरा विश्वास और पक्का हो गया कि सर हैं, तो सब ठीक हो जाएगा।

वह हम सबके लिए ब्रह्मास्त्र थे। सर को हमने हमेशा ऐसा ही पायाविश्वविद्यालय में कोई छात्र अगर लड़ाई-झगड़ा कर ले, नुशासनहीनता कर दे तो वह उसे खूब डांटते फटकारते थे, लेकिन उसके साथ खड़े रहते थे। उसका भविष्य खराब नहीं होने देते थे। शायद सर यह मानते थे कि बच्चों ने अपरिपक्व होने के कारण यह गलती की।

नहीं शब्द सर की डिक्शनरी में था ही नहीं। हम सबने इस बात को नोटिस किया था। मुश्किल से मुश्किल कार्य के लिए उनका जबाब होता था – ठीक है , अपन देखते हैं’,  ‘कुछ करते हैं अपन, कुछ तुम चिंता मत करो। ये शब्द हम सबके अंदर भरोसा जगाते थे। उनका देर रात तक डिपार्टमेंट में बैठे रहना। काम मे डूबे रहना। बच्चों के लिए हमेशा अपने दरवाजे खुले रखना। सीमित संसाधनों के बाद बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा देना। उनमें हमारी श्रद्धा को जगाता था।

मुझे याद है कि 2005-2006 में जब हम एमजे कर रहे थे, सर ने हमें अच्छा एक्स्पोजर देने के लिए हमारे लिए एक से बढ़कर एक गेस्ट टीचर बुलाए। भोपाल में कोई भी बड़ा पत्रकार या नामी गिरामी हस्ती आए, सर उन्हें किसी भी तरह हमारे लिए विभाग में खींच ही लाते थे। ये लेक्चर भी 3-3, 4-4 घंटों के होते थे। मुझे याद है एक बार मषहूर व्यंग्यकार आलोक पुराणिक को सर ने आमंत्रित किया था और करीब 10-12 घंटों तक उनकी क्लास चली थी।

हम लोग हर हफ्ते हमारा लैब जर्नल विकल्प निकालते थे। पीपी सर उसके संपादक थे। विकल्प की पहली बैठक से लेकर उसके प्रकाशित होने की हर प्रक्रिया में वह शामिल रहते थे।

सर को अपने हर स्टूडेंट की क्षमताओं का बहुत अच्छा ज्ञान होता था और वे उन्हें उसी के अनुसार जिम्मेदारियां भी दिया करते थे। मुझे याद है कि यूनिवर्सिटी में उस वक्त दीक्षांत समारोह आयोजित होने वाला था और हम सभी को उसके लिए विकल्प निकालना था। समारोह के एक दिन पहले हम लोग विकल्प को तैयार करने में लगे थे। लगभग सारी खबरें तय हो गई थीं और सिर्फ संपादकीय कॉलम के लिए जगह छूटी थी। संपादकीय लिखना हम सबके लिए काफी सम्मान की बात थी। सर शाम को लैब में आए और पेज को देखने के बाद संपादकीय लिखने की जिम्मेदारी मुझे सौंपी। यह मेरे लिए बहुत गौरव की बात थी।

सर ने मुझे ऐसे कई मौके दिए, जिन्होंने मेरा आत्मविश्वास बढ़ाया। वर्ष 2005-06 में मप्र के ही सागर जिले में एक महिला के सती होने का मामला सामने आया। घटनास्थल का दौरा करने पत्रकारों और एक्टिविस्ट की टीम जा रही थी, सर ने उनके साथ मुझे भेजा।

2005 में ही जब हमने एमजे कोर्स में दाखिला लिया था, उस वक्त मैं होशंगाबाद से ट्रेन से भोपाल आया-जाया करता था। ऐसे ही एक बार सर ने हम सभी को किसी क्लास के लिए रविवार को डिपार्टमेंट में बुलाया था। मैं होशंगाबाद से ट्रेन से आया, लेकिन हमारे कई साथी क्लास में नहीं आए। सर उसके एक-दो दिन बाद अनुपस्थित साथियों पर जमकर गुस्सा हुए और मेरा उदाहरण देते हुए कहा, ‘वो लड़का होषंगाबाद से क्लास अटेंड करने आया और तुम लोग यहीं के यही नहीं आ पाए। सर के इन शब्दों ने मुझे जबर्दस्त ताकत दी।

कैरियर से संबंधित मेरे हर कदम में सर का बड़ी भूमिका रही2007 में सर के प्रयासों से ही कैंपस सिलेक्शन के द्वारा हम अमर उजाला नोएडा पहुंचे। नवभारत टाइम्स में कुछ साल काम करने के बाद मैं भोपाल वापस लौटने के लिए व्याकुल होने लगा था। सर से इस बारे में कई बार बात हुई। सर शायद नहीं चाहते थे कि मैं वापस भोपाल आऊं, इसलिए एक बार उन्होंने मना किया और कई बार बात को टाल भी दिया, लेकिन मैं भोपाल वापस आने और रिपोर्टिंग करने के लिए बैचेन था, इसलिए उनसे हर मुलाकात में इस बारे में बात करता। आखिरकार, 2011 के अंत में मैं भोपाल आ गया, लेकिन यहां आने के बाद समझ आया कि सर क्यों मुझे वापस आने के लिए हतोत्साहित करते थे।

सर की वाणी में सरस्वती बसती थीं। उनका अनुभव कमाल था और मेरे लिए वो बहुत लकी भी थे। इसे मैं आपको एक उदाहरण के जरिए समझाता हूं। वर्ष 2015 में मैं बीएमएचआरसी में इंटरव्यू के लिए जा रहा था। सुबह करीब 815 बजे का वक्त रहा होगा। मैंने कैब बुक की और उसमें बैठते ही सर को फोन लगाया और कहा- सर आज मेरा इस पद के लिए इंटरव्यू है, आप बताइये इंटरव्यू में क्या-क्या पूछा जा सकता है और उसके क्या जबाव देना चाहिए। इसके बाद सर ने बताना शुरू किया और करीब आधे घंटे तक वो बताते रहे कि यह पूछा जा सकता है और तुम इसका इस तरह जबाव देना। किसी को यकीन नहीं होगा, लेकिन सच्चाई यह है कि सर ने मुझे जो प्रश्न मुझे बताए थे लगभग वो सारे प्रश्न इंटरव्यू में पूछे गए और मैंने उनका उसी तरह जबाव दिया, जैसा सर ने बताया था। नतीजा यह हुआ कि उस पद पर मेरा चयन हो गया।

सर के काफी स्टूडेंटस उनके बहुत अधिक फ्रेंडली थे। उनसे काफी हंसी मजाक कर लेते थे, लेकिन मैं ऐसा नहीं कर पाया। हमारे कई जूनियर्स ने उन्हें बाबा नाम से बुलाते थे, लेकिन मैंने ऐसा कभी नहीं कियाही सर को इस संबोधन से बुलाना मुझे पसंद ही नहीं था। मैं सर में अपने सबसे अच्छे, प्रिय और सम्मानित शिक्षक के तौर पर देखता था, इसलिए उनसे ऐसा शब्द बोलने का विचार ही मन में नहीं आया। उनके प्रति इस सम्मान की वजह से ही मैं कभी उनसे अपने कई अन्य मित्रों की तरह फ्रेंडली नहीं हो पाया। हम सब अक्सर कहते थे कि सर, एक चलते-फिरते Institute हैं, उनसे जितना सीख सकते हो सीख लो, इसलिए मैं हमेशा उनके पास बैठा रहना चाहता था। उनकी बातें सुनना चाहता था, उनको हंसते देखते रहना चाहता था। उनको यह सब करते देखना भी हमारे लिए एक लर्निंग थी। मेरी भी यही कोशिश होती थी कि जब भी उनसे मिलूं, कुछ न कुछ सीखता रहूं।

सर अपने विद्यार्थियों पर बहुत भरोसा करते थे, इसका एक उदाहरण आपको बताता हूं। करीब 13-14 साल पुरानी बात है। मैं उस वक्त दिल्ली में था। ये वो समय था, जब व्हाट्सएप शुरू नहीं हुआ था और अधिकतर काम ई-मेल के जरिए होता था। एक दिन मेरे पास सर का फोन आया। उन्हे ई-मेल से संबंधित कुछ काम था। उन्होंने मुझे अपना ई-मेल खोलने को कहा और अपना पासवर्ड भी दिया। अपने ई-मेल का पासवर्ड सैंकड़ों कोस दूर बैठे अपने स्टूडेंट को देना मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी। इस घटना ने मेरी नजरों में सर का कद और ऊंचा कर दिया। लेकिन इस घटना में एक बात थी, जो मुझे सर के लिए बहुत परेशान कर गई और वो थी सर के द्वारा मुझे बताया गया उनका पासवर्ड। यह पासवर्ड जानने के बाद मुझे अहसास हुआ कि हमेषा हंसते हुए दिखने वाले सर अपने सीने में कितना बड़ा दुख लेकर चल रहे हैं।

आज जब सर चले गए हैं, तो हमारे लिए उनके होने के हमारे लिए और क्या-क्या और मायने थे, यह अब समझ आ रहा है। मैं कई अन्य स्कूल और कॉलेज में भी पढ़ा, लेकिन मेरे ज़हन में जो सुनहरी यादें हैं, वो सिर्फ माखनलाल यूनिवर्सिटी की ही हैं और इनका सबसे बड़ा कारण हैं पीपी सिंह सर। मुझे छात्र जीवन तक अलग-अलग मुकामों पर कई अलग-अलग दोस्त मिले, लेकिन जो असली दोस्त थे वो इस माखनलाल में ही मिले। सिर्फ दोस्त ही नहीं, सीनियर और जूनियर भी ऐसे मिले, जो आज एक सच्चे दोस्त की ही तरह हैं। यह सबकुछ पीपी सर के कारण ही हुआ। अगर वो नहीं होते, तो क्या अपने से तीन-चार साल जूनियर और सीनियर से क्या ऐसा रिश्ता बन पाता ? नहीं, यकीन के साथ नहीं। 2005-07 के दौरान एमजे करते हुए बिताए वो दो साल मेरे और हम में से कई लोगों के जीवन का सर्वश्रेष्ठ समय रहा।

असली गुरू या शिक्षक का जीवन में क्या स्थान होता है, इस बारे में हमने किताबों में तो बहुत पढ़ा था, लेकिन असल जिंदगी में इस शब्द का अहसास सर ने हमें दिलाया। गुरू गोविंद दोउ खड़े, काके लागू पाँव, बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो मिलाये । कबीर दास जी ने इस दोहे मे गुरू के पहले पैर पखारने को सबसे पहले क्यों कहा है, इसका मतलब हमें आज समझ रहा है। कितने भाग्यशाली हैं हम लोग कि पीपी सिंह सर हमारी जिंदगी में आए और उसे एक नई दिशा दी। मुझे यह कहने में कोई संकोच नाही है कि सर के बगैर,  हम उस मंजिल तक कभी भी नहीं पहुँच पाते, जहां हम आज मौजूद हैं।

अंत में मुस्कुराहट के साथ सर को याद करना चाहता हूं और नवम्बर 2007 में दिल्ली में रात करीब 10 बजे आए उनके उस फोन कॉल को याद करना चाहता हूं, जब उन्होंने शरारती अंदाज में मुझसे पूछा था,  रितेश, _ _ _ _ _कहां है आजकल......। उनके ये शब्द आज भी मेरे चेहने पर मुस्कान बिखेर देते हैं।

 अलविदा सर....आप हर पल याद आएंगे। 

’’वर्तमान परिप्रेक्ष्य में श्री गुरूनानक देव जी के संदेशों की प्रासंगिकता’’


 प्रस्तावनाः करीब साढ़े पांच सौ साल पहले भारतीय समाज में धर्मान्धता, अंधविश्वास, जातिवाद, छुआछूत, भेदभाव जैसी कई सामाजिक बुराइयों की जड़ें बहुत गहरी जमी हुई थीं। चारों ओर कुशासन फैला हुआ था और भ्रष्टाचार का बोलबाला था। हिंदू और मुसलमानों के बीच तो गहरा विद्वेष था ही, संप्रदायों में भी बैरभाव पसर चुका था। ब्राह्मणों का वर्चस्व था और निम्न जाति के लोगों से अमानवीय व्यवहार किया जाता था। ऐसे दौर में गुरूनानक देव जी जैसे महान पुरूष ने जन्म लिया, जिन्होंने अपनी वाणी से न सिर्फ इन बुराइयों के खिलाफ आवाज बुलंद की, बल्कि समाज को एक अलग दिशा दी। गुरूनानक देव जी के व्यक्तित्व के कई पहलू थे। वे दार्शनिक थे, संत थे, विचारक थे, समाज सुधारक थे, ओजस्वी वक्ता थे और एक महान नेता भी थे। अपने इन गुणों की वजह से ही वह देश-विदेश की अपनी यात्राओं के दौरान लोगों तक अपने संदेश पहुंचा पाए और दुश्मन भी उनके समर्थक बन गए। उन्होंने अपनी इन यात्राओं के दौरान कीर्तन के जरिए लोगों को समाज में फैली विभिन्न कुरीतियों को दूर करने के लिए संदेश दिए। उन्होंने तीन सिद्धांत दिए- वंद चाको (जरूरतमंदों के साथ बांट कर खाओ), किरत करो (किसी को परेशान किए बिना ईमानदारी से काम करो), नाम जपो (प्रभु चिंतन करो)। उन्होंने लोगों से अपने अंदर मौजूद पांच बुराइयों (अहंकार, गुस्सा, लालच, मोह, काम-वासना) को खत्म करने को कहा। गुरूनानक जी के सभी संदेश आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने पांच सौ साल पहले थे, क्योंकि ये बुराइयां अभी भी हमारे समाज में व्याप्त हैं। तो आइये नजर डालते हैं गुरूनानक जी के उन संदेशों पर, और देखते हैं कि ये कुरीतियां किस तरह आज भी समाज में मौजूद हैं।

 1.ईश्वर एक है, अंधविश्वास से दूर रहोः चाहे हिंदू धर्म हो या इस्लाम, गुरू नानक ने दोनों ही धर्मों में फैली कुरीतियों और अंधविश्वासों का विरोध किया। वह कहते थे प्रभु किसी पत्थर की मूर्ति में नहीं हैं, वे तो कण-कण में समाए हुए हैं। देवी-देवताओं का निर्माण भी एक अदृश्य शक्ति ने किया है। अपनी अजमेर यात्रा के दौरान उन्होंने लोगों को तावीज देकर उनकी सारी समस्याएं सुलझाने के दावे पर अजमेर दरगाह के मजावर को खूब खरीखोटी सुनाई थीं। बचपन में अपने जनेऊ संस्कार का उन्होंने यह कहते हुए विरोध किया था कि जनेऊ जाति और लिंग के आधार पर मनुष्य में विभाजन पैदा करता है, क्योंकि नीची जाति के लोग और महिलाएं इसे पहन नहीं सकते।

वर्तमान स्थिति : हमारे समाज में अंधविश्वास खत्म नहीं हुआ है। आज भी लोग मंदिरों में मूर्तियों द्वारा दूध सोख लेने को चमत्कार की तरह देखते हैं। एक स्थान विशेष पर मंदिर बनाया जाए या मस्जिद, इसके लिए हम दशकों से लड़ रहे हैं। अपने धर्म को श्रेष्ठ साबित करने या खुद को अमर घोषित करने के लिए पार्क और कॉलोनियों में विशाल मूर्तियां लगवा रहे हैं। अपनी सबसे प्रिय वस्तु को अल्लाह को समर्पित करने के नाम पर बेजुबान जानवरों का कत्ल कर रहे हैं। बीमार होने पर डॉक्टर के पास जाने के बजाय झाड़-फूंक करवाते हैं। किसी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए परिश्रम करने के बजाय मंत्र-तंत्र-साधना में विश्वास रखते हैं। बिल्ली रास्ता काटे, तो सड़क पार नहीं करते।

2. सत्य के मार्ग पर चलो : गुरूनानक जी हमेशा सत्य बोलने और सत्य के मार्ग पर चलने का उपदेश देते थे। उन्होंने तो क्रूर मुगल शासक बाबर से ही कह दिया था, ष्तुम बाबर नहीं जाबर (अतिदुष्ट) हो।ष् गुरूनानक जी कहा करते थे, जो मनुष्य सत्य के मार्ग पर चलने का प्रयत्न करता है, प्रभु उसका साथ देते हैं। सत्य के मार्ग में कुछ कठिनाइयां अवश्य आएंगी, लेकिन जल्द ही सब सामान्य हो जाएगा।

वर्तमान स्थिति : आज समाज में झूठ का बोलबाला है। आदर्श, नैतिकता और मानवीयता जैसे गुण खत्म होते जा रहे हैं। बहुसंख्यक लोगों का मुख्य ध्येय यथासंभव अपना स्वार्थ सिद्ध करना है, फिर चाहे इसके लिए उन्हें कितने ही झूठ क्यों न बोलने पड़ें और कितने भी गलत काम क्यों न करना पड़े। भारत का वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य इसका सटीक उदाहरण है। आज हालात यह हो चुके हैं कि गंभीर अपराधों में लिप्त आरोपियों का भी नायक और देशभक्त की तरह सम्मान किया जा रहा है। उदाहरण के तौर पर दो घटनाओं पर नजर डाल सकते हैं। पहली, जब जनवरी 2018 में जम्मू कश्मीर के कठुआ में 8 साल की बच्ची के बलात्कार और हत्या के बाद स्थानीय लोगों और नेताओं ने आरोपियों के समर्थन में तिरंगा यात्रा निकाली थी। वहीं, दूसरी, जब बुलंदशहर में गोकशी के शक में एक इंस्पेक्टर समेत दो लोगों की हत्या के आरोपी पिछले दिनों जमानत पर जेल से वापस आए, तो लोगों ने उन्हें देशभक्त बताते हुए माला पहनाई।

 3.गरीब, बीमार और दुखियों की सहायता करो : गुरूनानक जी कहा करते थे, जरूरतमंद और भूखे की सेवा करना समाज का मुख्य दायित्व है। इसी वजह से उन्होंने सभी के लिए मुफ्त लंगर शुरू किया था। अपनी बड़ोदा यात्रा के दौरान गरीबों को परेशान करने वाले एक महाजन को उपदेश देते हुए उन्होंने कहा कि दया ही वास्तविक धर्म है। यदि कोई प्राणी प्रभु का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहता है, तो उसे समाज के निम्न व पीड़ित वर्ग की निष्काम सहायता करनी चाहिए। उनकी बात सुनकर महाजन गुरूनानक जी के चरणों में गिर गया और कहा कि मैं गरीबों का शोषण करना बंद कर दूंगा और सभी की संपिŸा लौटा दूंगा।

वर्तमान स्थिति : मनुष्य ने आज बहुत तरक्की कर ली है, लेकिन वह दुनिया से गरीबी और असमानता को खत्म नहीं कर पाया है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक, 2014 तक विश्व की आधी आबादी यानी 3 अरब लोग की प्रतिदिन की आय सिर्फ 2.5 डॉलर है। 1 अरब 30 लाख लोग अतिगरीब हैं। वर्ल्ड बैंक के मुताबिक, 2012 तक भारत में 27 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे अपना जीवन-यापन कर रहे हैं। यही नहीं, भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी काफी दयनीय है। सरकार ने दूर-दराज के इलाकों में अस्पताल तो बना दिए हैं, लेकिन वहां इलाज के लिए डॉक्टर नहीं है।

4.ईश्वर की निगाह में कोई छोटा-बड़ा नहीं : ऊंच-नीच का विरोध करते हुए गुरूनानक देव श्जपुजी साहिबश् में कहते हैं कि श्नानक उत्तम-नीच न कोईश् जिसका भावार्थ है कि ईश्वर की निगाह में कोई भी छोटा-बड़ा नहीं है। गुरूनानक जी ने लोगों को विश्व बंधुत्व का संदेश दिया। उन्होंने सभी समुदायों खासतौर पर हिंदू और मुसलमानों के बीच आपसी सौहार्द्र के लिए बहुत प्रयास किए। उनके बारे में एक कहावत मशहूर है-

गुरूनानक शाह फकीर, हिंदू का गुरू, मुसलमानों का पीर

वर्तमान स्थितिः पूरी दुनिया आज भी नस्लवाद, संप्रदायवाद से जूझ रही है। भारत में नमें ब्रिटेन, अमेरिका, फ्रांस, न्यूजीलैंड व कई अन्य देशों में आतंकवादी हमले हुए हैं। हमारे देश में जात-पात की जड़ें अब भी जमी हुई हैं। उदाहरण के लिए कर्नाटक की एक घटना पर नजर डालें, जहां हाल ही में एक सांसद ए नारायणस्वामी को दलित होने की वजह से उनके संसदीय क्षेत्र के गांव में नहीं घुसने दिया गया। नैशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक, वर्ष 2006-2016 के बीच दलित और अनुसूचित जाति के लोगों के खिलाफ 4 लाख से ज्यादा अपराध दर्ज हुए।

5.   मन को नियंत्रित करोः गुरूनानक जी मन को नियंत्रित करने को सबसे महत्वपूर्ण मानते थे। वे कहते थे कि तीर्थों पर स्नान करने से पवित्रता नहीं मिलती। ईश्वर शरीर की पवित्रता पर नहीं, बल्कि मन की पवित्रता पर रीझते हैं। हमें अपना ध्यान मन की शुद्धता पर केंद्रित करना चाहिए, क्योंकि उसे नियंत्रित करना बहुत कठिन है।

वर्तमान स्थितिः आज लोगों के मन में पवित्रता नहीं है। लोग असल जिंदगी में तो कई गलत कार्य करते हैं, लेकिन दुनिया के सामने खुद को ईमानदार बताते हैं। मन के अशांत होने से लोगों की इच्छाएं असीमित हो गई हैं और उन्हें पूरा करने के लिए वह अनैतिक कार्यों की ओर अग्रसर होता है।

 6.माया का मोह छोड़ो और न्यायोचित साधन से धन अर्जित करो :  गुरूनानक जी अपने कीर्तन में कहा करते थे कि माया का जो प्रसार हम देख रहे हैं, वह सुहावना तो प्रतीत होता है, लेकिन इसके पीछे कभी न समाप्त होने वाला क्लेश है। वह कहते थे कि अपनी कमाई का दसवंद’ (1ध्10) परोकार के लिए एवं अपने समय का (1ध्10) ईश्वर भक्ति के लिए लगाना चाहिए। मेहनत कर, लोभ त्याग कर, न्यायोचित साधनों से धन का अर्जन करना चाहिए। एक साहूकार, मलिक भागो  की रोटी से खून एवं एक गरीब, भाई लालो की मेहनत से कमाई रोटी से दूध निकलता दिखा कर उन्होंने इस शिक्षा को जनमानस तक पहुंचाया था।

वर्तमान स्थिति : आज के दौर में हर कोई धन के पीछे भाग रहा है। इसे एक हिंदी फिल्म के गाने के बोल ष्बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपैयाष् से अच्छी तरह समझ सकते हैं। धन के कारण रिश्ते टूट रहे हैं। लोगों के लिए धन-संपत्ति के आगे घर-परिवार, मां-बाप, भाई-बहन की भी कोई अहमियत नहीं है। धन ईमानदारी से कमाया जा रहा है, या बेईमानी से, इसकी परवाह भी किसी को नहीं है। व्यापारी ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए मिलावटी और घटिया सामान बेच रहे हैं, वहीं कई नेता, अफसर सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए रिश्वत ले रहे हैं।

 7.नारी का सम्मान करोः गुरुनानकजी कहा करते थे कि हर महिला का आदर करना चाहिए और उसे तुच्छ समझने की गलती कभी नहीं करनी चाहिए। मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को अपवित्र समझने वालों से वह कहते थे कि मासिक धर्म एक सहज प्रक्रिया है। जो लोग इसे अशुद्ध या अपवित्र जानकर माताओं-बहनों का उपहास करते हैं, वे स्वयं बर्बाद हो जाते हैं।

वर्तमान स्थिति : आज महिलाओं की स्थिति में सुधार तो आया है, लेकिन उन्हें अब भी पुरुषों के बराबर हक नहीं दिया जाता। गांवों में ही नहीं, शहरों में भी मासिक धर्म के दौरान महिलाओं से अछूत की तरह व्यवहार किया जाता है। लोग आज भी लड़के की चाहत में बालिका भ्रूण को कोख के अंदर ही मार देते हैं। दहेज के लिए महिला की हत्या तक कर दी जाती है। बाहरी दुनिया में भी महिलाओं को सिर्फ भोग-विलास की वस्तु समझा जाता है।

 8.पशुओं के खिलाफ न करें हिंसा : गुरूनानक जी ने अपनी यात्राओं के दौरान कई स्थानों पर पाया कि लोग धर्म के नाम पर पशुओं का वध करते हैं। उन्होंने इसका पुरजोर विरोध किया। वे कहते थे कि समस्त जीव-जंतु, पशु-पक्षी इत्यादि प्रभु परमेश्वर की ही उत्पिŸा हैं। सभी प्राणियों का पिता वह स्वयं है, ऐसे में वह अपने अपने पुत्र के वध से कैसे प्रसन्न हो सकता है।

वर्तमान स्थिति : वर्तमान में पशुओं के खिलाफ क्रूरता बढ़ती जा रही है। हर साल बकरीद पर लाखों-करोड़ों जानवरों की हत्या की जाती है। अभी भी कई मंदिरों में जानवरों की बलि दी जाती है। शहरों में जानवरों का मांस, खाल इत्यादि की जरूरतों के लिए बड़ी संख्या में बूचड़खानों में पशुओं को काटा जाता है। प्रतिबंध के बावजूद जंगलों में बाघ, हाथी, गैंडा आदि जानवरों का शिकार किया जाता है। लोग तोता-मैना जैसे कई पक्षियों को अपने मनोरंजन के लिए पिंजरों में कैद करके रखते हैं।

 9.नशे से दूर रहोः गुरूनानक जी ने कहा था कि व्यक्ति को सभी तरह के नशे से दूर रहना चाहिए। मनुष्य यौवन के आवेश में नशे को अपनाकर अपने जीवन को विकारों से ग्रस्त कर लेता है। गुरूनानक जी ने चीन के शंघाई शहर में जाकर अफीम जैसे नशीले पदार्थों से लोगों को सावधान िंकया।

वर्तमान स्थिति : आज न सिर्फ युवावर्ग बल्कि बच्चे भी नशे की गिरफ्त में हैं। हमें स्कूल जाने वाले छोटे-छोटे बच्चे कहीं भी गुटखा खाते और सिगरेट पीते हुए मिल जाएंगे। एक बड़ा युवा वर्ग ड्रग्स, कोकीन, गांजा जैसे मादक पदार्थों का आदी हो गया हैं। महिलाएं भी खुद को पुरुषों के बराबर दिखाने के लिए खुलेआम सिगरेट और तंबाकू पीने लगी हैं।

उपसंहार : गुरुनानक जी अपनी पूरी जिन्दगी के दौरान जिन बुराइयों के खिलाफ लोगों को जागरुक करते रहे वो आज भी अपना सिर उठाकर खड़ी हैं। लोग आज भी धर्म और जाति के आधार पर बंटे हुए हैं। न सिर्फ लोग बल्कि देश भी अमीर और गरीब की श्रेणी में विभाजित हैं। इस धरा पर आज भी बड़ी मात्रा में गरीबी और भुखमरी फैली हुई है। नस्ल और लिंग के आधार पर लोगों से भेदभाव जारी है। समृद्धि और विकास के नाम पर संसाधनों का अंधाधुंध दोहन किया जा रहा है। तथाकथित सभ्य और विकसित देशों के बीच महाविनाश के हथियार बनाने की होड़ मची है। ऐसी परिस्थितियों में गुरुनानक जी के संदेशों का महत्व और बढ़ जाता है। आज हमें गुरुनानक जी के संदेशों को अपने निजी और सार्वजनिक जीवन में उतारना होगा। लोगों को समझाना होगा कि धर्मांन्धता, कट्टरता, नस्लवाद, जातिवाद, अंधविश्वास, हिंसा, लालच, सत्तालोलुपता पूरी दुनिया को विनाश के रास्ते पर ले जा रहे हैं। आपस में प्यार, भाईचारा, विश्वास जगाने के लिए उनकी सोच को बदलना होगा। उन्हें झूठी मान्यताओं, रूढ़ियों, अंधविश्वासों, आडंबरों से दूर करना होगा। लोगों को एकजुट करके समाज को बांटने वालों को बहिष्कृत करना होगा। चुनाव में धर्म और जाति के नाम पर नहीं, बल्कि विकास, शिक्षा, अच्छी स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर वोट देना होगा। हमें इन सभी कार्यों के लिए गुरुनानक जी जैसे ऐसे पथप्रदर्शकों की जरूरत है, जो युवाओं के रोल मॉडल बन सकें और उन्हें ऐसे रास्ते पर ले जा सकें, जहां सिर्फ खुशहाली हो, दुख व परेशानियों का नामोनिशान न हो।

 (गुरु नानक के 750 वी जयंती के उपलक्ष्य में 2019 में पंजाबी साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित निबंध प्रतियोगिता के लिए यह निबंध लिखा गया था।