रीतेश पुरोहित
नई दिल्ली ।। आठ ऑस्कर अवॉर्ड जीतने वाली फिल्म स्लमडॉग मिलिनेअर में स्लम में रहने वाले एक बच्चे को करोड़पति बनते हुए दिखाया गया है। रीयल लाइफ में भी झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले कई बच्चे बड़ा आदमी बनने के सपने को हकीकत में बदलने के लिए जी-जान से जुटे हैं। एनसीआर के पब्लिक स्कूलों में पढ़ रहे ये बच्चे बुनियादी सुविधाओं के अभाव में भी संपन्न घरों के बच्चों को पछाड़कर अव्वल आ रहे हैं। ये बच्चे बड़े होकर अपने जैसे ही गरीब बच्चों को पढ़ाकर एक बेहतर इंसान बनाना चाहते हैं। काफी सारे बच्चों का कहना है कि उन्हें मौका मिले तो वे भी कमाल कर सकते हैं।
निजामुद्दीन ब्रिज के पास यमुना से सटी झुग्गी बस्ती में रहने वाला 18 साल का विवेकानंद बिलासपुर (छत्तीसगढ़) से अपने पैरंट्स के साथ यहां आया था। घर में कमाने वाला केवल बड़ा भाई है, जो पेंटर है। विवेकानंद पहले यमुना में लोगों के फेंके गए सिक्के बीनने का काम करता था। कई सालों तक वह स्कूल नहीं जा पाया लेकिन बाद में एक एनजीओ 'राहुल मल्टी डिसिप्लनरी रिसर्च सेंटर' की मदद से उसने धीरे-धीरे पढ़ना सीखा। अब वह पंढारा रोड स्थित एक स्कूल में अपनी क्लास में अव्वल है। उसने कड़कड़ाती ठंड में स्ट्रीट लाइट के नीचे बैठकर पढ़ाई की है। विवेकानंद ने दोस्तों से स्लमडॉग मिलिनेअर के बारे में सुना। वह कहता है कि जिस तरह फिल्म में एक स्लम में रहने वाला जमाल इतना पॉपुलर हो जाता है, उसी तरह मैं भी खूब पढ़-लिखकर नाम कमाना चाहता हूं।
इंदिरा पुरम, गाजियाबाद में डीपीएस स्कूल के पास स्थित स्लम बस्ती में रहने वाली 13 साल की शिखा प्राइमरी स्कूल में तीसरी क्लास तक पढ़ाई करने के बाद कुछ सोशल वर्कर्स का साथ पाकर एक पब्लिक स्कूल में एडमिशन लेने पहुंची। स्कूल के प्रिंसिपल ने शिखा को चौथी क्लास में एडमिशन देने से मना करते हुए उसका नाम तीसरी क्लास में ही लिखने पर जोर दिया। शिखा ने इसे एक चैलेंज की तरह लिया। अब वह छठवीं क्लास में है और पांचवीं में 83 पसेर्ंट नंबर पाकर वह स्कूल टॉपर रही। शिखा के पिता भी उसे पढ़ाना नहीं चाहते थे।
शिखा के स्कूल में ही सातवीं क्लास में पढ़ने वाले संजीत दास की कहानी भी ऐसी ही है। उसके पिता रिक्शा चलाते हैं और मां घरों में बर्तन धोने का काम करती हैं। संजीत ने स्लमडॉग मिलियनेयर देखी है और फिल्म को ऑस्कर मिलने से वह बहुत खुश है। फिल्म में जमाल की भूमिका निभाने वाले देव पटेल का रोल उसे बहुत पसंद आया। संजीत कहता है कि एक झुग्गी बस्ती में रहने वाले किसी लड़के को करोड़पति बनते देखना वाकई में काफी रोमांचकारी है। यह फिल्म स्लम में रहने वाले सभी बच्चों के लिए एक आस बंधाती है।
सोमवार को ही एनजीओ 'चेतना' ने झुग्गी बस्ती में रहने वाले बच्चों को यह फिल्म दिखाई। कीतिर् नगर के कमला नेहरू कैंप में रहने वाले श्रवण का कहना है कि यह फिल्म उनके जैसे बच्चों की सही तस्वीर सामने लाती है। कढ़ाई के काम में जुटे 16 साल के विजय के मुताबिक इस तरह की और भी फिल्में बननी चाहिए, ताकि लोगों को हमारे मुश्किल जिंदगी के बारे में पता चल सके।
http://navbharattimes.indiatimes.com/rssarticleshow/4178739.cms
Monday, April 19, 2010
वेलकम करेंगे दिल्ली के 7 ऐतिहासिक शहर
रीतेश पुरोहित
नई दिल्ली।। अगले साल होने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान दिल्ली अपने मॉडर्न रूप के साथ साथ सदियों पुराना इतिहास दिखाने के लिए भी तैयार हो रही है। गेम्स के दौरान आने वाले विदेशी टूरिस्टों को यहां के इतिहास की झलक दिखाने के लिए आर्कियॉलजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) ने 46 स्मारकों को चुना है। एएसआई के सुपरिंटेंडेंट आर्कियॉलजिस्ट के. के. मोहम्मद ने बताया कि 25 करोड़ रुपये के बजट से इन धरोहरों को अगले साल अगस्त तक संरक्षित करने और खूबसूरत बनाने का काम पूरा कर लिया जाएगा। इन सभी जगहों पर काम जोरों पर चल रहा है।
जिन 46 स्मारकों को चुना गया है उनमें दिल्ली के सात शहरों के नाम से मशहूर किला राय पिथौरा, सीरी, तुगलकाबाद, जहांपनाह, कोटला फिरोज शाह, पुराना किला और शाहजहांनाबाद शामिल हैं। इनके अलावा हुमायूं का मकबरा, अरब की सराय, सफदरजंग का मकबरा, कश्मीरी गेट और दरियागंज की वॉल्ड सिटी, जंतर-मंतर कॉम्पलेक्स और दिल्ली गेट कुछ खास नाम हैं। मोहम्मद ने बताया कि इन स्मारकों को चुनने में हमने कई बातों का ध्यान रखा, मसलन वह कितने साल पुराना है, उसका ऐतिहासिक महत्व क्या है। इसके अलावा यह भी देखा गया कि इमारत की अभी क्या हालत है और वह कितना पॉप्युलर है। वहां जाना आसान है या नहीं।
उन्होंने बताया कि इन सभी जगहों पर काम लगातार किया जा रहा है और उम्मीद है कि अगले साल अगस्त तक इसे पूरा कर लिया जाएगा। इसके अलावा एएसआई इंटैक (इंडियन नैशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट ऐंड कल्चरल हेरिटेज) के साथ लोदी गार्डन पर मौजूद पांच स्मारकों को दुरुस्त करने का काम कर रहा है। इनमें से एक पर काम पूरा हो गया है, जबकि बाकी पर काम जारी है।
कैसे लौटेगी खूबसूरती
इन सभी स्थानों पर किए जाने वाले काम को पांच हिस्सों में बांटा गया है।
1. मरम्मत का काम
टूटी-फूटी इमारतों पर कंस्ट्रक्शन का काम करके उन्हें पुराना लुक देने की कोशिश की जा रही है। अगर किसी छत से पानी टपक रहा है, तो उसे वॉटर टाइटनिंग के जरिए ठीक किया जा रहा है। दीवारों के बीच बने जॉइंट्स को भरने और उखड़ी हुई दीवारों पर प्लास्टरिंग करने का काम हो रहे हैं। इस पूरे काम में करीब 8.50 करोड़ रुपये का खर्च आएगा।
2. जरूरी सुविधाएं
न सिर्फ स्मारकों, बल्कि उसके पूरे परिसर को अच्छा लुक देने का काम किया जा रहा है। इसके तहत परिसर के रास्तों को दुरुस्त करना, रेलिंग और बाउंड्री वॉल की मरम्मत व कलर करना, इंटरनैशनल स्तर के टॉयलेट बनाना, पीने के पानी की व्यवस्था करना, पब्लिकेशन काउंटर बनाना और नए साइनेज लगाने का काम शामिल है। एएसआई का दिल्ली सर्कल इस पूरे काम को अंजाम देगा। अनुमान है कि इस काम में 6.31 करोड़ रुपये लगेंगे।
3. केमिकल ट्रीटमेंट
इमारत पर जम गई गंदगी को दूर करने और इस पर लिखे नाम को हटाने के लिए केमिकल ट्रीटमेंट का सहारा लिया जा रहा है। 9.20 करोड़ रुपये की लागत से पूरे होने वाले इस काम के तहत एक खास केमिकल का इस्तेमाल करके दीवारें साफ की जा रही हैं। एएसआई की साइंस ब्रांच यह काम कर रही है।
4. होगा हरा भरा
आसपास की जगहों पर घास बिछाई जा रही है। साथ ही पौधे भी लगाए जा रहे हैं। हॉर्टिकल्चर डिपार्टमेंट इसकी जिम्मेदारी संभालेगा। इस काम में करीब 5.17 करोड़ रुपये लगेंगे।
5. रोशनी की व्यवस्था
रात में भी स्मारक खूबसूरत नजर आएं, इसके लिए अंदर व बाहर लाइटिंग का काम किया जा रहा है। इससे ये ऐतिहासिक इमारतें और सुंदर नजर आएंगी। भारत सरकार का टूरिजम डिपार्टमेंट इस काम को पूरा करेगा। करीब 4.85 करोड़ रुपये की लागत से यह काम होगा।
नई दिल्ली।। अगले साल होने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान दिल्ली अपने मॉडर्न रूप के साथ साथ सदियों पुराना इतिहास दिखाने के लिए भी तैयार हो रही है। गेम्स के दौरान आने वाले विदेशी टूरिस्टों को यहां के इतिहास की झलक दिखाने के लिए आर्कियॉलजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) ने 46 स्मारकों को चुना है। एएसआई के सुपरिंटेंडेंट आर्कियॉलजिस्ट के. के. मोहम्मद ने बताया कि 25 करोड़ रुपये के बजट से इन धरोहरों को अगले साल अगस्त तक संरक्षित करने और खूबसूरत बनाने का काम पूरा कर लिया जाएगा। इन सभी जगहों पर काम जोरों पर चल रहा है।
जिन 46 स्मारकों को चुना गया है उनमें दिल्ली के सात शहरों के नाम से मशहूर किला राय पिथौरा, सीरी, तुगलकाबाद, जहांपनाह, कोटला फिरोज शाह, पुराना किला और शाहजहांनाबाद शामिल हैं। इनके अलावा हुमायूं का मकबरा, अरब की सराय, सफदरजंग का मकबरा, कश्मीरी गेट और दरियागंज की वॉल्ड सिटी, जंतर-मंतर कॉम्पलेक्स और दिल्ली गेट कुछ खास नाम हैं। मोहम्मद ने बताया कि इन स्मारकों को चुनने में हमने कई बातों का ध्यान रखा, मसलन वह कितने साल पुराना है, उसका ऐतिहासिक महत्व क्या है। इसके अलावा यह भी देखा गया कि इमारत की अभी क्या हालत है और वह कितना पॉप्युलर है। वहां जाना आसान है या नहीं।
उन्होंने बताया कि इन सभी जगहों पर काम लगातार किया जा रहा है और उम्मीद है कि अगले साल अगस्त तक इसे पूरा कर लिया जाएगा। इसके अलावा एएसआई इंटैक (इंडियन नैशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट ऐंड कल्चरल हेरिटेज) के साथ लोदी गार्डन पर मौजूद पांच स्मारकों को दुरुस्त करने का काम कर रहा है। इनमें से एक पर काम पूरा हो गया है, जबकि बाकी पर काम जारी है।
कैसे लौटेगी खूबसूरती
इन सभी स्थानों पर किए जाने वाले काम को पांच हिस्सों में बांटा गया है।
1. मरम्मत का काम
टूटी-फूटी इमारतों पर कंस्ट्रक्शन का काम करके उन्हें पुराना लुक देने की कोशिश की जा रही है। अगर किसी छत से पानी टपक रहा है, तो उसे वॉटर टाइटनिंग के जरिए ठीक किया जा रहा है। दीवारों के बीच बने जॉइंट्स को भरने और उखड़ी हुई दीवारों पर प्लास्टरिंग करने का काम हो रहे हैं। इस पूरे काम में करीब 8.50 करोड़ रुपये का खर्च आएगा।
2. जरूरी सुविधाएं
न सिर्फ स्मारकों, बल्कि उसके पूरे परिसर को अच्छा लुक देने का काम किया जा रहा है। इसके तहत परिसर के रास्तों को दुरुस्त करना, रेलिंग और बाउंड्री वॉल की मरम्मत व कलर करना, इंटरनैशनल स्तर के टॉयलेट बनाना, पीने के पानी की व्यवस्था करना, पब्लिकेशन काउंटर बनाना और नए साइनेज लगाने का काम शामिल है। एएसआई का दिल्ली सर्कल इस पूरे काम को अंजाम देगा। अनुमान है कि इस काम में 6.31 करोड़ रुपये लगेंगे।
3. केमिकल ट्रीटमेंट
इमारत पर जम गई गंदगी को दूर करने और इस पर लिखे नाम को हटाने के लिए केमिकल ट्रीटमेंट का सहारा लिया जा रहा है। 9.20 करोड़ रुपये की लागत से पूरे होने वाले इस काम के तहत एक खास केमिकल का इस्तेमाल करके दीवारें साफ की जा रही हैं। एएसआई की साइंस ब्रांच यह काम कर रही है।
4. होगा हरा भरा
आसपास की जगहों पर घास बिछाई जा रही है। साथ ही पौधे भी लगाए जा रहे हैं। हॉर्टिकल्चर डिपार्टमेंट इसकी जिम्मेदारी संभालेगा। इस काम में करीब 5.17 करोड़ रुपये लगेंगे।
5. रोशनी की व्यवस्था
रात में भी स्मारक खूबसूरत नजर आएं, इसके लिए अंदर व बाहर लाइटिंग का काम किया जा रहा है। इससे ये ऐतिहासिक इमारतें और सुंदर नजर आएंगी। भारत सरकार का टूरिजम डिपार्टमेंट इस काम को पूरा करेगा। करीब 4.85 करोड़ रुपये की लागत से यह काम होगा।
पार्क जमाली-कमाली : खूबसूरत और खाली
रीतेश पुरोहित।। कुतुब मीनार परिसर से करीब 100 मीटर दूर स्थित यह पार्क लगभग 200 एकड़ में फैला हुआ है और
यहां कुल 80 स्मारक हैं। वैसे यह जमाली कमाली पार्क के नाम से भी मशहूर है। अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य वाली इस जगह पर आकर आप इतिहास से सीधे रूबरू हो सकेंगे। इन स्मारकों के बीच आकर लगता है कि मानो हम अतीत के उस सुनहरे दौर में पहुंच गए हों। इन स्मारकों को देखने के बाद आप बिना इनकी तारीफ किए नहीं रह पाएंगे। माना कि यहां के स्मारक कुतुब मीनार की तरह नहीं हैं, लेकिन यह किसी से कम भी नहीं हैं।
करीब एक हजार साल की विरासत के गवाह इस स्थान पर काफी सालों पहले डीडीए और इंटैक (इंडियन नैशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज) ने संरक्षण का काम शुरू किया था। यहां फूल मार्किट के पीछे जाने पर सबसे पहले मुगल काल का बना कुआं आपका स्वागत करेगा। इसके आगे गुलाबों की बहुत बड़ी और खूबसूरत बगिया है। इसके आगे दो और बहुत सुंदर बागीचे हैं। यहां बैठने के लिए कई बेंच लगी हुई हैं और स्टूल भी। यहीं से कुछ ऊंचाई पर मैटकॉफ की छतरी है। ईस्ट इंडिया कंपनी के समय में भारत के प्रशासक रहे चार्ल्स मैटकॉफ की यह छतरी ऊंचाई पर होने के कारण काफी सुंदर दिखाई देती है। इससे कुछ ही आगे जाने पर जमाली और कमाली का मकबरा है। जमाली उर्फ शेख फजलुल्लाह एक संत और कवि थे। इस मकबरे का निर्माण 1528-29 में शुरू हुआ था, लेकिन हुमायूं के शासन के दौरान पूरी तरह बनकर तैयार हुआ। आगे जाने पर बलवन का मकबरा है, जो 16-17 शताब्दी में बना था। इनके अलावा अन्य स्मारकों में मैटकॉफ का ब्रिज और बोट हाउस, कुली खां का मकबरा, लोधी काल का गेटवे, मुगल काल के मकबरे, राजाओं की बावली प्रमुख हैं।
इस पार्क के बारे में दिल्ली के बहुत सारे लोगों को जानकारी नहीं है। इस वजह से यहां काफी कम ही लोग मौजूद होते हैं। हालांकि पार्क के पास सड़क है, लेकिन इसके काफी बड़ा होने से यहां कोई शोरशराबा नहीं होता। यह पार्क सुबह से लेकर शाम तक खुला रहता है। कोई एंट्री फीस नहीं है और कितनी ही देर तक बैठने पर भी कोई रोकटोक नहीं है। हालांकि खाने-पीने का सामान आपको कुतुबमीनार से ही लाना होगा, क्योंकि यहां आसपास कोई दुकान वाला नहीं है। यहां मौजूद कुछ स्मारकों के केवल अवशेष ही बचे हैं। यदि इस पूरे क्षेत्र का संरक्षण पहले हो चुका होता तो शायद यह जगह और भी खूबसूरत होती। बहरहाल, इस वैलंटाइंस और वीक एंड को कुछ खास बनाने के लिए यह एकदम सही जगह हो सकती है।
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/4127495.cms
यहां कुल 80 स्मारक हैं। वैसे यह जमाली कमाली पार्क के नाम से भी मशहूर है। अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य वाली इस जगह पर आकर आप इतिहास से सीधे रूबरू हो सकेंगे। इन स्मारकों के बीच आकर लगता है कि मानो हम अतीत के उस सुनहरे दौर में पहुंच गए हों। इन स्मारकों को देखने के बाद आप बिना इनकी तारीफ किए नहीं रह पाएंगे। माना कि यहां के स्मारक कुतुब मीनार की तरह नहीं हैं, लेकिन यह किसी से कम भी नहीं हैं।
करीब एक हजार साल की विरासत के गवाह इस स्थान पर काफी सालों पहले डीडीए और इंटैक (इंडियन नैशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज) ने संरक्षण का काम शुरू किया था। यहां फूल मार्किट के पीछे जाने पर सबसे पहले मुगल काल का बना कुआं आपका स्वागत करेगा। इसके आगे गुलाबों की बहुत बड़ी और खूबसूरत बगिया है। इसके आगे दो और बहुत सुंदर बागीचे हैं। यहां बैठने के लिए कई बेंच लगी हुई हैं और स्टूल भी। यहीं से कुछ ऊंचाई पर मैटकॉफ की छतरी है। ईस्ट इंडिया कंपनी के समय में भारत के प्रशासक रहे चार्ल्स मैटकॉफ की यह छतरी ऊंचाई पर होने के कारण काफी सुंदर दिखाई देती है। इससे कुछ ही आगे जाने पर जमाली और कमाली का मकबरा है। जमाली उर्फ शेख फजलुल्लाह एक संत और कवि थे। इस मकबरे का निर्माण 1528-29 में शुरू हुआ था, लेकिन हुमायूं के शासन के दौरान पूरी तरह बनकर तैयार हुआ। आगे जाने पर बलवन का मकबरा है, जो 16-17 शताब्दी में बना था। इनके अलावा अन्य स्मारकों में मैटकॉफ का ब्रिज और बोट हाउस, कुली खां का मकबरा, लोधी काल का गेटवे, मुगल काल के मकबरे, राजाओं की बावली प्रमुख हैं।
इस पार्क के बारे में दिल्ली के बहुत सारे लोगों को जानकारी नहीं है। इस वजह से यहां काफी कम ही लोग मौजूद होते हैं। हालांकि पार्क के पास सड़क है, लेकिन इसके काफी बड़ा होने से यहां कोई शोरशराबा नहीं होता। यह पार्क सुबह से लेकर शाम तक खुला रहता है। कोई एंट्री फीस नहीं है और कितनी ही देर तक बैठने पर भी कोई रोकटोक नहीं है। हालांकि खाने-पीने का सामान आपको कुतुबमीनार से ही लाना होगा, क्योंकि यहां आसपास कोई दुकान वाला नहीं है। यहां मौजूद कुछ स्मारकों के केवल अवशेष ही बचे हैं। यदि इस पूरे क्षेत्र का संरक्षण पहले हो चुका होता तो शायद यह जगह और भी खूबसूरत होती। बहरहाल, इस वैलंटाइंस और वीक एंड को कुछ खास बनाने के लिए यह एकदम सही जगह हो सकती है।
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हिस्ट्री और फ्यूचर के बीच लटकी पार्किन्ग
रीतेश पुरोहित
नई दिल्ली।। एएसआई के करीब 50 साल पुराने कानून को बदल कर सरकार ने कॉमनवेल्थ गेम्
स से जुड़े प्रोजेक्टों को फौरी राहत दे दी है। लेकिन बहादुरशाह जफर मार्ग पर अंडरग्राउंड मल्टिलेवल पार्किन्ग बनाने का एमसीडी का प्रोजेक्ट अब भी लटका है। आर्कियॉलजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) का कहना है कि पार्किन्ग की प्रस्तावित जगह को आर्कियॉलजी के नजरिए से इन्वेस्टिगेट करने की जरूरत है। एमसीडी को जीपीआर (ग्राउंड पेनिटरेटिंग रेडार) सवेर् करके बताना होगा कि साइट की जगह पर उस जमाने का कोई ऐतिहासिक स्ट्रक्चर तो मौजूद नहीं हैं।
कॉमनवेल्थ गेम्स से जुड़े प्रोजेक्टों को कानूनी अड़चनों से बचाने के लिए केंद्र सरकार ने हाल ही में अध्यादेश लाकर 1958 के ऐक्ट में संशोधन किया था। पिछले साल दिसंबर में हाई कोर्ट ने एक याचिका की सुनवाई करते हुए एएसआई को आदेश दिया था कि किसी भी संरक्षित स्मारक के 100 मीटर के दायरे में हो रहे हर कंस्ट्रक्शन को तुरंत रोके। कोर्ट ने स्मारक के प्रतिबंधित दायरे में कंस्ट्रक्शन को अनुमति देने वाली एक्सपर्ट्स अडवाइजरी कमिटी को भी गैरकानूनी करार देते हुए भंग कर दिया था। इसके बाद एएसआई ने प्रतिबंधित दायरे में हो रहे कॉमनवेल्थ गेम्स से संबंधित प्रोजेक्टों के अलावा 92 निर्माण कार्यों से संबंधित एजेंसी या व्यक्ति को नोटिस जारी कर तुरंत काम बंद करने को कहा था।
ऐसे में इन प्रोजेक्टों के पूरा होने पर खतरा मंडराने लगा था। सरकार ने अध्यादेश लाकर इसका हल ढूंढ लिया। इस अध्यादेश के तहत स्मारक के 100 मीटर के दायरे में चल रहे कॉमनवेल्थ गेम्स के प्रोजेक्टों के लिए कानून में छूट दे दी गई है। हालांकि शहीदी पार्क के पास एमसीडी की प्रस्तावित पार्किन्ग को हरी झंडी नहीं मिल पाई। इसकी वजह यह है कि एएसआई ने इस पार्किन्ग के लिए कभी अपनी मंजूरी दी ही नहीं थी।
एएसआई के एक आला अधिकारी का कहना है कि शहीदी पार्क के पास ही फिरोजशाह कोटला का किला है। तुगलक वंश के शासक फिरोजशाह तुगलक ने इसका निर्माण किया था और इस किले के आसपास ही अपना शहर बसाया था। ऐसे में इस बात की संभावना है कि प्रस्तावित पार्किन्ग की जमीन के नीचे कई पुरातात्विक अवशेष हों। पार्किन्ग के निर्माण से ये अवशेष नष्ट हो सकते हैं। इसी वजह से हमने एमसीडी से कहा है कि वह इस जगह का जीपीआर सवेर् कराए। जीपीआर सर्वे के तहत सैटलाइट तरंगों को जमीन पर डाला जाता है। हमने एमसीडी से यह भी कहा है कि वह किले की बाउंड्री और शहीदी पार्क की बाउंड्री से संबंधित डिटेल प्लान तैयार करके दे। अगर एमसीडी ऐसा करती है, तभी इस प्रस्तावित पार्किन्ग पर विचार किया जाएगा। इस पूरे एरिया को भी आर्कियॉलजी के नजरिए से इन्वेस्टिगेट करने की जरूरत है। बहादुरशाह जफर मार्ग पर पार्किन्ग की भारी समस्या को देखते हुए एमसीडी ने शहीदी पार्क के पास अंडरग्राउंड पार्किन्ग बनाने की योजना बनाई थी।
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/5525946.cms
नई दिल्ली।। एएसआई के करीब 50 साल पुराने कानून को बदल कर सरकार ने कॉमनवेल्थ गेम्
स से जुड़े प्रोजेक्टों को फौरी राहत दे दी है। लेकिन बहादुरशाह जफर मार्ग पर अंडरग्राउंड मल्टिलेवल पार्किन्ग बनाने का एमसीडी का प्रोजेक्ट अब भी लटका है। आर्कियॉलजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) का कहना है कि पार्किन्ग की प्रस्तावित जगह को आर्कियॉलजी के नजरिए से इन्वेस्टिगेट करने की जरूरत है। एमसीडी को जीपीआर (ग्राउंड पेनिटरेटिंग रेडार) सवेर् करके बताना होगा कि साइट की जगह पर उस जमाने का कोई ऐतिहासिक स्ट्रक्चर तो मौजूद नहीं हैं।
कॉमनवेल्थ गेम्स से जुड़े प्रोजेक्टों को कानूनी अड़चनों से बचाने के लिए केंद्र सरकार ने हाल ही में अध्यादेश लाकर 1958 के ऐक्ट में संशोधन किया था। पिछले साल दिसंबर में हाई कोर्ट ने एक याचिका की सुनवाई करते हुए एएसआई को आदेश दिया था कि किसी भी संरक्षित स्मारक के 100 मीटर के दायरे में हो रहे हर कंस्ट्रक्शन को तुरंत रोके। कोर्ट ने स्मारक के प्रतिबंधित दायरे में कंस्ट्रक्शन को अनुमति देने वाली एक्सपर्ट्स अडवाइजरी कमिटी को भी गैरकानूनी करार देते हुए भंग कर दिया था। इसके बाद एएसआई ने प्रतिबंधित दायरे में हो रहे कॉमनवेल्थ गेम्स से संबंधित प्रोजेक्टों के अलावा 92 निर्माण कार्यों से संबंधित एजेंसी या व्यक्ति को नोटिस जारी कर तुरंत काम बंद करने को कहा था।
ऐसे में इन प्रोजेक्टों के पूरा होने पर खतरा मंडराने लगा था। सरकार ने अध्यादेश लाकर इसका हल ढूंढ लिया। इस अध्यादेश के तहत स्मारक के 100 मीटर के दायरे में चल रहे कॉमनवेल्थ गेम्स के प्रोजेक्टों के लिए कानून में छूट दे दी गई है। हालांकि शहीदी पार्क के पास एमसीडी की प्रस्तावित पार्किन्ग को हरी झंडी नहीं मिल पाई। इसकी वजह यह है कि एएसआई ने इस पार्किन्ग के लिए कभी अपनी मंजूरी दी ही नहीं थी।
एएसआई के एक आला अधिकारी का कहना है कि शहीदी पार्क के पास ही फिरोजशाह कोटला का किला है। तुगलक वंश के शासक फिरोजशाह तुगलक ने इसका निर्माण किया था और इस किले के आसपास ही अपना शहर बसाया था। ऐसे में इस बात की संभावना है कि प्रस्तावित पार्किन्ग की जमीन के नीचे कई पुरातात्विक अवशेष हों। पार्किन्ग के निर्माण से ये अवशेष नष्ट हो सकते हैं। इसी वजह से हमने एमसीडी से कहा है कि वह इस जगह का जीपीआर सवेर् कराए। जीपीआर सर्वे के तहत सैटलाइट तरंगों को जमीन पर डाला जाता है। हमने एमसीडी से यह भी कहा है कि वह किले की बाउंड्री और शहीदी पार्क की बाउंड्री से संबंधित डिटेल प्लान तैयार करके दे। अगर एमसीडी ऐसा करती है, तभी इस प्रस्तावित पार्किन्ग पर विचार किया जाएगा। इस पूरे एरिया को भी आर्कियॉलजी के नजरिए से इन्वेस्टिगेट करने की जरूरत है। बहादुरशाह जफर मार्ग पर पार्किन्ग की भारी समस्या को देखते हुए एमसीडी ने शहीदी पार्क के पास अंडरग्राउंड पार्किन्ग बनाने की योजना बनाई थी।
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/5525946.cms
ऐतिहासिक स्थलों को टूरिस्ट फ्रेंडली बनाएंगे
पिछले दिनों डॉ. गौतम सेन गुप्ता ने आर्कियॉलजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) के महानिदेशक का पद संभाला। सालों बाद इस पद पर किसी आर्कियॉलजिस्ट का आना निश्चय ही महत्वपूर्ण है। रीतेश पुरोहित ने उनसे बातचीत कर यह जानने की कोशिश की कि यह जिम्मेदारी संभालने के बाद डिपार्टमेंट को लेकर उनकी क्या योजनाएं हैं और मौजूदा समस्याओं से निपटने के लिए वह कौन सी रणनीति अपनाएंगे।
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/5778871.cms
अरसे बाद एक आर्कियॉलजिस्ट ने फिर से एएसआई के महानिदेशक का पद संभाला है। पिछले 15 सालों के दौरान कई पक्ष अनछुए रह गए हैं। इनके बारे में अब आपकी क्या प्लानिंग है और आपका क्या विजन है?
मुझे अभी इस पद को संभाले ज्यादा दिन नहीं हुए हैं। फिलहाल तो मैं डिपार्टमेंट से संबंधित हर मुद्दे को अच्छी तरह समझ रहा हूं। इस समय हम डिपार्टमेंट में स्पेशलाइज्ड लोगों की कमी से जूझ रहे हैं। इसके लिए हम अपने डिपार्टमेंट के लोगों को ट्रेंड करके इस समस्या को सुलझाना चाहते हैं। लोगों को ऐतिहासिक स्मारकों से जोड़ने के लिए हम पब्लिक रिलेशन प्रोग्राम्स पर भी जोर दे रहे हैं। हम हेरिटेज साइट्स को टूरिस्ट फ्रेंडली बनाने में जुटे हैं, लेकिन यह एक लॉन्ग टर्म प्रोसेस है।
देश भर में ऐसी कई ऐतिहासिक इमारतें हैं, जिन पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। कई जगहों पर अवैध कब्जे हैं, असामाजिक तत्व यहां डेरा डाले रहते हैं। इस तरह की प्रॉब्लम्स से निपटने के लिए आपके पास क्या ऐक्शन प्लान है?
हम इन सभी प्रॉब्लम्स को जानते हैं। संसद के इसी सत्र में ऐतिहासिक स्मारकों से संबंधित नया कानून पास हुआ है। नए ऐक्ट में इन सभी प्रॉब्लम्स को सॉल्व करने के लिए कुछ नए नियम और प्रावधान किए गए हैं।
कॉमनवेल्थ गेम्स के मद्देनजर 46 स्मारकों पर कन्जर्वेशन और रिस्टोरेशन का काम हो रहा है, लेकिन क्या आपको लगता है कि गेम्स के बाद भी इन स्मारकों पर इसी तरह ध्यान दिया जाएगा और ये फिर से नजरअंदाज नहीं किए जाएंगे?
गेम्स केवल हमारे लिए नहीं पूरे देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। दिल्ली एक ऐतिहासिक शहर है, इसलिए इन खेलों के मद्देनजर हमारी जिम्मेदारी भी काफी है, लेकिन मुझे पूरा भरोसा है कि गेम्स के बाद भी सभी ऐतिहासिक स्मारकों पर हमारा पूरा ध्यान रहेगा।
कानून के मुताबिक केंद्र द्वारा संरक्षित किसी भी स्मारक के 100 मीटर के दायरे में कोई भी कंस्ट्रक्शन या खुदाई नहीं की जा सकती। ऐसी शिकायत मिलने पर एएसआई पुलिस में शिकायत करती है, लेकिन यहां तो देखते ही देखते पूरी बिल्डिंग खड़ी हो जाती है। एएसआई इसे पुलिस की जिम्मेदारी मानती है, लेकिन समस्या जस की तस रहती है। ऐसे में सॉल्यूशन क्या है?
सभी संबंधित डिपार्टमेंट बेहतर तालमेल से काम करें, तभी यह समस्या सुलझ सकती है।
1958 के ऐक्ट के मुताबिक 100 साल पुराने किसी राष्ट्रीय महत्व के स्मारक को संरक्षित घोषित किया जा सकता है, लेकिन देश में कई ऐसे स्मारक हैं जो सैंकड़ों साल पुराने हैं, लेकिन एएसआई की लिस्ट में शामिल नहीं हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि किसी ऐतिहासिक स्मारक को राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित करने की नीति क्या है?
यह बात एकदम सही है कि कई सारे स्मारक ऐसे हैं, जो 100 साल से ज्यादा पुराने हैं, लेकिन वे एएसआई के संरक्षित स्मारकों की लिस्ट में शामिल नहीं हैं। सेंट्रल अडवाइजरी बोर्ड ऑफ आर्कियॉलजी की मीटिंग में इस बारे में चर्चा की गई है। भारत सरकार की इस पर नजर है। हालांकि हम हर साल नए स्मारकों को अपनी लिस्ट में शामिल करते जा रहे हैं।
पूरे देश में इस समय तेजी से डिवेलपमेंट वर्क हो रहा है, लेकिन कई जगहों पर इसके कारण हमारे ऐतिहासिक स्मारक नष्ट होते जा रहे हैं। इस बारे में आपका क्या कहना है?
यह अकेले भारत की नहीं, पूरे विश्व के लिए बहुत बड़ी समस्या है, लेकिन फ्यूचर के लिए डिवेलपमेंट बहुत जरूरी है। ऐसे में डिवेलपमेंट और कन्जर्वेशन में एक बैलेंस होना चाहिए यानी डिवेलपमेंट इस तरह हो, जिससे ऐतिहासिक धरोहर को नुकसान न पहुंचे।
आप खुद ऐकडेमिक बैकग्राउंड से आते हैं। आर्कियॉलजी से संबंधित रिसर्च के बारे में आपकी क्या योजनाएं हैं?
इस फील्ड में रिसर्च कराना हमारे मुख्य अजेंडे में है। हम प्री-हिस्ट्री, हिस्टोरिक आर्कियॉलजिकल साइंस, कंजर्वेशन स्टैंडर्ड आदि सब्जेक्ट्स पर रिसर्च कराना चाहते हैं।
देश में आपके 24 सर्कल हैं और हजारों ऐतिहासिक स्मारक आपके संरक्षित स्मारकों की लिस्ट में शामिल हैं, लेकिन डिपार्टमेंट की संरचना सुदृढ़ नहीं है। एएसआई के पास इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं है। डिपार्टमेंट हर स्तर पर कर्मचारियों और अधिकारियों की कमी से जूझ रहा है।
यह सही है। हम इस बारे में सरकार से बात कर रहे हैं। हमारी कोशिश है कि जल्द से जल्द इस कमी को पूरा किया जाए।
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/5778871.cms
अरसे बाद एक आर्कियॉलजिस्ट ने फिर से एएसआई के महानिदेशक का पद संभाला है। पिछले 15 सालों के दौरान कई पक्ष अनछुए रह गए हैं। इनके बारे में अब आपकी क्या प्लानिंग है और आपका क्या विजन है?
मुझे अभी इस पद को संभाले ज्यादा दिन नहीं हुए हैं। फिलहाल तो मैं डिपार्टमेंट से संबंधित हर मुद्दे को अच्छी तरह समझ रहा हूं। इस समय हम डिपार्टमेंट में स्पेशलाइज्ड लोगों की कमी से जूझ रहे हैं। इसके लिए हम अपने डिपार्टमेंट के लोगों को ट्रेंड करके इस समस्या को सुलझाना चाहते हैं। लोगों को ऐतिहासिक स्मारकों से जोड़ने के लिए हम पब्लिक रिलेशन प्रोग्राम्स पर भी जोर दे रहे हैं। हम हेरिटेज साइट्स को टूरिस्ट फ्रेंडली बनाने में जुटे हैं, लेकिन यह एक लॉन्ग टर्म प्रोसेस है।
देश भर में ऐसी कई ऐतिहासिक इमारतें हैं, जिन पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। कई जगहों पर अवैध कब्जे हैं, असामाजिक तत्व यहां डेरा डाले रहते हैं। इस तरह की प्रॉब्लम्स से निपटने के लिए आपके पास क्या ऐक्शन प्लान है?
हम इन सभी प्रॉब्लम्स को जानते हैं। संसद के इसी सत्र में ऐतिहासिक स्मारकों से संबंधित नया कानून पास हुआ है। नए ऐक्ट में इन सभी प्रॉब्लम्स को सॉल्व करने के लिए कुछ नए नियम और प्रावधान किए गए हैं।
कॉमनवेल्थ गेम्स के मद्देनजर 46 स्मारकों पर कन्जर्वेशन और रिस्टोरेशन का काम हो रहा है, लेकिन क्या आपको लगता है कि गेम्स के बाद भी इन स्मारकों पर इसी तरह ध्यान दिया जाएगा और ये फिर से नजरअंदाज नहीं किए जाएंगे?
गेम्स केवल हमारे लिए नहीं पूरे देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। दिल्ली एक ऐतिहासिक शहर है, इसलिए इन खेलों के मद्देनजर हमारी जिम्मेदारी भी काफी है, लेकिन मुझे पूरा भरोसा है कि गेम्स के बाद भी सभी ऐतिहासिक स्मारकों पर हमारा पूरा ध्यान रहेगा।
कानून के मुताबिक केंद्र द्वारा संरक्षित किसी भी स्मारक के 100 मीटर के दायरे में कोई भी कंस्ट्रक्शन या खुदाई नहीं की जा सकती। ऐसी शिकायत मिलने पर एएसआई पुलिस में शिकायत करती है, लेकिन यहां तो देखते ही देखते पूरी बिल्डिंग खड़ी हो जाती है। एएसआई इसे पुलिस की जिम्मेदारी मानती है, लेकिन समस्या जस की तस रहती है। ऐसे में सॉल्यूशन क्या है?
सभी संबंधित डिपार्टमेंट बेहतर तालमेल से काम करें, तभी यह समस्या सुलझ सकती है।
1958 के ऐक्ट के मुताबिक 100 साल पुराने किसी राष्ट्रीय महत्व के स्मारक को संरक्षित घोषित किया जा सकता है, लेकिन देश में कई ऐसे स्मारक हैं जो सैंकड़ों साल पुराने हैं, लेकिन एएसआई की लिस्ट में शामिल नहीं हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि किसी ऐतिहासिक स्मारक को राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित करने की नीति क्या है?
यह बात एकदम सही है कि कई सारे स्मारक ऐसे हैं, जो 100 साल से ज्यादा पुराने हैं, लेकिन वे एएसआई के संरक्षित स्मारकों की लिस्ट में शामिल नहीं हैं। सेंट्रल अडवाइजरी बोर्ड ऑफ आर्कियॉलजी की मीटिंग में इस बारे में चर्चा की गई है। भारत सरकार की इस पर नजर है। हालांकि हम हर साल नए स्मारकों को अपनी लिस्ट में शामिल करते जा रहे हैं।
पूरे देश में इस समय तेजी से डिवेलपमेंट वर्क हो रहा है, लेकिन कई जगहों पर इसके कारण हमारे ऐतिहासिक स्मारक नष्ट होते जा रहे हैं। इस बारे में आपका क्या कहना है?
यह अकेले भारत की नहीं, पूरे विश्व के लिए बहुत बड़ी समस्या है, लेकिन फ्यूचर के लिए डिवेलपमेंट बहुत जरूरी है। ऐसे में डिवेलपमेंट और कन्जर्वेशन में एक बैलेंस होना चाहिए यानी डिवेलपमेंट इस तरह हो, जिससे ऐतिहासिक धरोहर को नुकसान न पहुंचे।
आप खुद ऐकडेमिक बैकग्राउंड से आते हैं। आर्कियॉलजी से संबंधित रिसर्च के बारे में आपकी क्या योजनाएं हैं?
इस फील्ड में रिसर्च कराना हमारे मुख्य अजेंडे में है। हम प्री-हिस्ट्री, हिस्टोरिक आर्कियॉलजिकल साइंस, कंजर्वेशन स्टैंडर्ड आदि सब्जेक्ट्स पर रिसर्च कराना चाहते हैं।
देश में आपके 24 सर्कल हैं और हजारों ऐतिहासिक स्मारक आपके संरक्षित स्मारकों की लिस्ट में शामिल हैं, लेकिन डिपार्टमेंट की संरचना सुदृढ़ नहीं है। एएसआई के पास इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं है। डिपार्टमेंट हर स्तर पर कर्मचारियों और अधिकारियों की कमी से जूझ रहा है।
यह सही है। हम इस बारे में सरकार से बात कर रहे हैं। हमारी कोशिश है कि जल्द से जल्द इस कमी को पूरा किया जाए।
वाह! क्या नाम है
डीएमके नेता एम. करुणानिधि के बेटों में राजनीतिक वर्चस्व के लिए संघर्ष चल रहा है. जब भी करुणानिधि के सुपुत्र एम.के. स्टालिन की चर्चा होती है, लोग जानने को उत्सुक हो जाते हैं कि उनका नाम और तमिल नामों से इतना अलग क्यों है?
दरअसल द्रविड़ आंदोलन के सूत्रधार पेरियार ई.वी. रामास्वामी अपनी सोवियत संघ की यात्रा के बाद कम्युनिस्ट आंदोलन से बहुत प्रभावित हो गए थे। वह सोवियत नेताओं की खूब चर्चा करते थे। इस कारण उस दौर में तमिलनाडु में स्टालिन और लेनिन नाम प्रचलित हो गए। अपने नेता की तरह एम. करणानिधि भी सोवियत नेताओं से प्रभावित थे। उन्होंने अपने एक बेटे का नाम स्टालिन रखा। करुणानिधि के इस बेटे के जन्म के चार दिनों के बाद ही सोवियत नेता जोसेफ स्टालिन की मौत हो गई।
आरजेडी अध्यक्ष और पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव की बड़ी बेटी का नाम मीसा है। इसका अर्थ क्या है? मीसा का मतलब है- मेंटिनेंस ऑफ इंटरनल सिक्युरिटी एक्ट। यह कानून इमर्जेंसी के दौर में लाया गया था, जिसके तहत कई अन्य नेताओं के साथ लालू भी जेल में बंद रहे। उसी दौरान उनकी इस बेटी का जन्म हुआ।
हमारे देश में दिलचस्प नामों के रोचक संदर्भ हैं। अंडरवर्ल्ड में अजीबोगरीब नाम मिलते हैं। दाऊद इब्राहिम का एक शार्गिद मोहम्मद सलीम मोहम्मद इकबाल कुरैशी सलीम फ्रूट के नाम से फेमस हुआ। वजह यह थी कि उसके पिता फलों का धंधा करते थे और बाद में उसने भी यहीं धंधा अपना लिया था। एक और सलीम था। उसके पास कई टेंपो थे, जिनके जरिए वह अपने टेंपो को स्मगलिंग के लिए किराए पर दिया करता था, इसलिए उसका नाम पड़ गया- सलीम टेंपो।
दरअसल द्रविड़ आंदोलन के सूत्रधार पेरियार ई.वी. रामास्वामी अपनी सोवियत संघ की यात्रा के बाद कम्युनिस्ट आंदोलन से बहुत प्रभावित हो गए थे। वह सोवियत नेताओं की खूब चर्चा करते थे। इस कारण उस दौर में तमिलनाडु में स्टालिन और लेनिन नाम प्रचलित हो गए। अपने नेता की तरह एम. करणानिधि भी सोवियत नेताओं से प्रभावित थे। उन्होंने अपने एक बेटे का नाम स्टालिन रखा। करुणानिधि के इस बेटे के जन्म के चार दिनों के बाद ही सोवियत नेता जोसेफ स्टालिन की मौत हो गई।
आरजेडी अध्यक्ष और पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव की बड़ी बेटी का नाम मीसा है। इसका अर्थ क्या है? मीसा का मतलब है- मेंटिनेंस ऑफ इंटरनल सिक्युरिटी एक्ट। यह कानून इमर्जेंसी के दौर में लाया गया था, जिसके तहत कई अन्य नेताओं के साथ लालू भी जेल में बंद रहे। उसी दौरान उनकी इस बेटी का जन्म हुआ।
हमारे देश में दिलचस्प नामों के रोचक संदर्भ हैं। अंडरवर्ल्ड में अजीबोगरीब नाम मिलते हैं। दाऊद इब्राहिम का एक शार्गिद मोहम्मद सलीम मोहम्मद इकबाल कुरैशी सलीम फ्रूट के नाम से फेमस हुआ। वजह यह थी कि उसके पिता फलों का धंधा करते थे और बाद में उसने भी यहीं धंधा अपना लिया था। एक और सलीम था। उसके पास कई टेंपो थे, जिनके जरिए वह अपने टेंपो को स्मगलिंग के लिए किराए पर दिया करता था, इसलिए उसका नाम पड़ गया- सलीम टेंपो।
पहले कूड़ा देखो, फिर अशोक का शिलालेख
रीतेश पुरोहित ।। नई दिल्ली
ईस्ट ऑफ कैलाश में मौर्य शासक सम्राट अशोक का दुर्लभ शिलालेख देखने स्टों का सबसे पहले सामना होता है, यहां फैली बदबू से। यह बदबू आती है इस ऐतिहासिक स्मारक के इकलौते एंट्री गेट के दोनों ओर पड़े रहने वाले कूड़े से। तीन सालों से यहां कूड़ा डाला जा रहा है और इसकी संभावना बेहद कम है कि आने वाले समय में भी यहां कूड़ा इकट्ठा होना बंद हो। वजह यह है कि एमसीडी के पास कूड़ा डालने के लिए इस एरिया में कोई और जगह ही नहीं है। नियमत: किसी भी संरक्षित स्मारक के पास कूड़ा फेंका जाना गलत है। यह जगह उन ऐतिहासिक स्मारकों की लिस्ट में है, जिन पर कॉमनवेल्थ गेम्स के मद्देनजर खास ध्यान दिया जा रहा है।
साउथ दिल्ली में कैप्टन गौड़ मार्ग और कालकाजी मंदिर के पास मौजूद ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी का यह शिलालेख इलाके के रेजिडेंशल इलाके में खुदाई के दौरान मिला था। 1996 में आर्कियॉलजिस्टों ने इसे पहचाना। यह शिलालेख सम्राट अशोक द्वारा लिखे उन आदेशों में से एक है, जिसमें उन्होंने भारत के लोगों को करीब लाने के लिए और धम्म (धर्म) के बारे में बताने के लिए शिक्षा दी थी। दस लाइनों के इस उद्बोधन को प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में लिखा गया है। हालांकि अब इस पर लिखे अक्षर भी ठीक से दिखाई नहीं देते।
कॉमनवेल्थ गेम्स के मद्देनजर एएसआई की यहां नए साइनेज लगाने, नए टॉयलेट ब्लॉक्स बनाने और सौंदर्यीरण की प्लानिंग है। सूत्र बताते हैं कि बौद्ध धर्म के लोगों के लिए यह स्थान बेहद मायने रखता है। यहां अक्सर विदेशों से बौद्ध पर्यटक भी आते हैं, लेकिन एंट्री गेट के दोनों तरफ लगे कूड़े के ढेर की वजह से उनकी सारी उत्सुकता खत्म हो जाती है। सूत्रों का कहना है कि पहले यह कूड़ा गेट के अंदर पड़ा होता था। पिछले साल यहां थाइलैंड की राजकुमारी आई थीं। उस समय यहां बहुत बड़ा कार्यक्रम किया गया था। तब इस कूड़े के ढेर को उनकी नजरों से बचाने के लिए बाहर लाया गया और ढक दिया गया। तबसे कूड़े का अंदर फेंका जाना बंद हो गया। सूत्रों का कहना है कि घरों से इकट्ठा होने वाला कूड़ा भी यहीं फेंका जाता है। इसके बाद कूड़े को यहां से उठाकर ले जाया जाता है।
एएसआई अधिकारियों का कहना है कि हमने इस बारे में एमसीडी को एक बार लेटर लिखा था, लेकिन एमसीडी ने हमें बताया कि उसके पास इलाके में कोई और ऐसी जगह नहीं है, जहां इस कॉलोनी में इकट्ठे होने वाले कूड़े को फेंका जाए। एमसीडी प्रवक्ता दीप माथुर ने भी माना कि हमारे पास यहां ऐसी कोई जगह नहीं है, जहां इस कूड़े को फेंका जा सके। हालांकि हमने सेनेटरी इंस्पेक्टर को निदेर्श दिए हैं कि यहां पर्याप्त सफाई रखी जाए, ताकि बदबू न आए। हम कोशिश कर रहे हैं कि ऐसी कोई जगह मिल जाए, जहां कूड़े को फेंका जा सके। उन्होंने इस बात पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया कि कॉमनवेल्थ गेम्स तक यह पूरा कर लिया जाएगा या नहीं। हालांकि एएसआई अधिकारियों को पूरा भरोसा है कि इस ऐतिहासिक स्मारक के गेट पर लगने वाले कूड़े को हर हाल में हटाया जाएगा। उनका कहना है कि हम इसके लिए एमसीडी के आला अधिकारियों से बात करेंगे।
ईस्ट ऑफ कैलाश में मौर्य शासक सम्राट अशोक का दुर्लभ शिलालेख देखने स्टों का सबसे पहले सामना होता है, यहां फैली बदबू से। यह बदबू आती है इस ऐतिहासिक स्मारक के इकलौते एंट्री गेट के दोनों ओर पड़े रहने वाले कूड़े से। तीन सालों से यहां कूड़ा डाला जा रहा है और इसकी संभावना बेहद कम है कि आने वाले समय में भी यहां कूड़ा इकट्ठा होना बंद हो। वजह यह है कि एमसीडी के पास कूड़ा डालने के लिए इस एरिया में कोई और जगह ही नहीं है। नियमत: किसी भी संरक्षित स्मारक के पास कूड़ा फेंका जाना गलत है। यह जगह उन ऐतिहासिक स्मारकों की लिस्ट में है, जिन पर कॉमनवेल्थ गेम्स के मद्देनजर खास ध्यान दिया जा रहा है।
साउथ दिल्ली में कैप्टन गौड़ मार्ग और कालकाजी मंदिर के पास मौजूद ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी का यह शिलालेख इलाके के रेजिडेंशल इलाके में खुदाई के दौरान मिला था। 1996 में आर्कियॉलजिस्टों ने इसे पहचाना। यह शिलालेख सम्राट अशोक द्वारा लिखे उन आदेशों में से एक है, जिसमें उन्होंने भारत के लोगों को करीब लाने के लिए और धम्म (धर्म) के बारे में बताने के लिए शिक्षा दी थी। दस लाइनों के इस उद्बोधन को प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में लिखा गया है। हालांकि अब इस पर लिखे अक्षर भी ठीक से दिखाई नहीं देते।
कॉमनवेल्थ गेम्स के मद्देनजर एएसआई की यहां नए साइनेज लगाने, नए टॉयलेट ब्लॉक्स बनाने और सौंदर्यीरण की प्लानिंग है। सूत्र बताते हैं कि बौद्ध धर्म के लोगों के लिए यह स्थान बेहद मायने रखता है। यहां अक्सर विदेशों से बौद्ध पर्यटक भी आते हैं, लेकिन एंट्री गेट के दोनों तरफ लगे कूड़े के ढेर की वजह से उनकी सारी उत्सुकता खत्म हो जाती है। सूत्रों का कहना है कि पहले यह कूड़ा गेट के अंदर पड़ा होता था। पिछले साल यहां थाइलैंड की राजकुमारी आई थीं। उस समय यहां बहुत बड़ा कार्यक्रम किया गया था। तब इस कूड़े के ढेर को उनकी नजरों से बचाने के लिए बाहर लाया गया और ढक दिया गया। तबसे कूड़े का अंदर फेंका जाना बंद हो गया। सूत्रों का कहना है कि घरों से इकट्ठा होने वाला कूड़ा भी यहीं फेंका जाता है। इसके बाद कूड़े को यहां से उठाकर ले जाया जाता है।
एएसआई अधिकारियों का कहना है कि हमने इस बारे में एमसीडी को एक बार लेटर लिखा था, लेकिन एमसीडी ने हमें बताया कि उसके पास इलाके में कोई और ऐसी जगह नहीं है, जहां इस कॉलोनी में इकट्ठे होने वाले कूड़े को फेंका जाए। एमसीडी प्रवक्ता दीप माथुर ने भी माना कि हमारे पास यहां ऐसी कोई जगह नहीं है, जहां इस कूड़े को फेंका जा सके। हालांकि हमने सेनेटरी इंस्पेक्टर को निदेर्श दिए हैं कि यहां पर्याप्त सफाई रखी जाए, ताकि बदबू न आए। हम कोशिश कर रहे हैं कि ऐसी कोई जगह मिल जाए, जहां कूड़े को फेंका जा सके। उन्होंने इस बात पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया कि कॉमनवेल्थ गेम्स तक यह पूरा कर लिया जाएगा या नहीं। हालांकि एएसआई अधिकारियों को पूरा भरोसा है कि इस ऐतिहासिक स्मारक के गेट पर लगने वाले कूड़े को हर हाल में हटाया जाएगा। उनका कहना है कि हम इसके लिए एमसीडी के आला अधिकारियों से बात करेंगे।
Saturday, March 27, 2010
एएसआई पर गिरा कब्रिस्तान का पेड़
रीतेश पुरोहित/8 जनवरी 2010
नई दिल्ली।। एक पेड़ गिरा और एएसआई जाग गया। लोथियंस रोड का कब्रिस्तान कई सालों अपनी खराब हालत को सुधारे जाने का इंतजार कर रहा था लेकिन एएसआई को होश अब आया है। टूटे हुए पेड़ों ने इसमें अहम भूमिका निभाई। इस कब्रिस्तान में अंग्रेजों की 200 साल से भी ज्यादा पुरानी 200 कब्रें और कुछ छतरियां हैं। इनमें से कई अब टूट चुकी हैं और और कुछ के अवशेष बचे हैं। अब एएसआई इस पूरे कब्रिस्तान के संरक्षण की तैयारी कर रहा है और जल्द ही यहां काम शुरू करने वाला है।
कश्मीरी गेट पर रेलवे ब्रिज के पास स्थित लोथियन कब्रिस्तान दिल्ली में ब्रिटिशों का पहला कब्रिस्तान था। 1808 से 1867 के बीच यहां ईसाई समुदाय के लोगों को दफनाया जाता था। बाद में कुछ लोगों ने इस कब्रिस्तान पर अवैध तौर पर कब्जा कर लिया और यहां पक्के मकान बना लिए। एएसआई ने भी इसे अपने संरक्षित स्मारकों की लिस्ट में शामिल कर लिया था, लेकिन इसके बाद भी कई सालों तक वे यहां बिना किसी रोकटोक के रहते रहे।
सूत्रों के मुताबिक, जब जगमोहन केंद्र सरकार में मंत्री थे, तब इस कब्रिस्तान को अवैध कब्जे से मुक्त कराया गया था। तभी यहां की बाउंड्री वॉल बनाई गई और लोहे का गेट लगाया गया। हालांकि फिर इन कब्रों के संरक्षण की ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया। नतीजतन मरम्मत का इंतजार कर रही इन कब्रों की हालत और खराब होने लगी। कुछ समय पहले इस कब्रिस्तान में लगे दो-तीन पेड़ टूटकर कब्र पर गिर गए, जिसके बाद अब तक कुछ कब्रें पेड़ों के नीचे दबी हुई हैं। इससे कब्रों को बुरी तरह नुकसान हुआ है। ये कब्र अभी भी पेड़ के नीचे ही दबी हुई हैं। इसके बाद एएसआई ने इस कब्रिस्तान के संरक्षण के लिए पक्का मन बनाया।
एएसआई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि पहले हमें फंड को लेकर काफी प्रॉब्लम रहती थी, इसी वजह से इन कब्रों की मरम्मत के बारे में कुछ भी तय नहीं हो पा रहा था। एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि हमने इस कब्रिस्तान का दौरा कर सभी कब्रों की स्थिति को देख लिया है। इनमें से कुछ कब्रों की मरम्मत का काम होगा और जरूरत पड़ने पर कुछ पत्थरों को बदला भी जाएगा।
हमारी पहली कोशिश यह रहेगी कि कब्रों या पिलर के जो हिस्से टूट गए हैं, उन्हें ही वापस लगाया जा सके, ताकि यह कब्रिस्तान अपने पुराने रूप में आ सके। पेड़ों के नीचे दबी कब्रों को बाहर निकाला जाएगा। पहले इस काम में खर्च होने वाले पैसे का हिसाब लगाया जाएगा और डिपार्टमेंट से अंतिम मंजूरी मिलने के बाद अगले महीने से हम काम शुरू कर देंगे।
बताया जाता है कि एक अंग्रेज अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल लोथियन केर स्कॉट के कार्यकाल के दौरान 1867 में ही इस कब्रिस्तान के पास मौजूद रेलवे ब्रिज का निर्माण हुआ था। इसी वजह से उनके नाम पर ही इस कब्रिस्तान और सड़क का नाम पड़ा। एक बेहद बड़े साइज में बना 'क्रॉस' का चिह्न इस कब्रिस्तान का मुख्य आकर्षण है। कहते हैं कि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान मारे गए अंग्रेजों की याद में इस ममॉरियल को बनाया गया था।
नई दिल्ली।। एक पेड़ गिरा और एएसआई जाग गया। लोथियंस रोड का कब्रिस्तान कई सालों अपनी खराब हालत को सुधारे जाने का इंतजार कर रहा था लेकिन एएसआई को होश अब आया है। टूटे हुए पेड़ों ने इसमें अहम भूमिका निभाई। इस कब्रिस्तान में अंग्रेजों की 200 साल से भी ज्यादा पुरानी 200 कब्रें और कुछ छतरियां हैं। इनमें से कई अब टूट चुकी हैं और और कुछ के अवशेष बचे हैं। अब एएसआई इस पूरे कब्रिस्तान के संरक्षण की तैयारी कर रहा है और जल्द ही यहां काम शुरू करने वाला है।
कश्मीरी गेट पर रेलवे ब्रिज के पास स्थित लोथियन कब्रिस्तान दिल्ली में ब्रिटिशों का पहला कब्रिस्तान था। 1808 से 1867 के बीच यहां ईसाई समुदाय के लोगों को दफनाया जाता था। बाद में कुछ लोगों ने इस कब्रिस्तान पर अवैध तौर पर कब्जा कर लिया और यहां पक्के मकान बना लिए। एएसआई ने भी इसे अपने संरक्षित स्मारकों की लिस्ट में शामिल कर लिया था, लेकिन इसके बाद भी कई सालों तक वे यहां बिना किसी रोकटोक के रहते रहे।
सूत्रों के मुताबिक, जब जगमोहन केंद्र सरकार में मंत्री थे, तब इस कब्रिस्तान को अवैध कब्जे से मुक्त कराया गया था। तभी यहां की बाउंड्री वॉल बनाई गई और लोहे का गेट लगाया गया। हालांकि फिर इन कब्रों के संरक्षण की ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया। नतीजतन मरम्मत का इंतजार कर रही इन कब्रों की हालत और खराब होने लगी। कुछ समय पहले इस कब्रिस्तान में लगे दो-तीन पेड़ टूटकर कब्र पर गिर गए, जिसके बाद अब तक कुछ कब्रें पेड़ों के नीचे दबी हुई हैं। इससे कब्रों को बुरी तरह नुकसान हुआ है। ये कब्र अभी भी पेड़ के नीचे ही दबी हुई हैं। इसके बाद एएसआई ने इस कब्रिस्तान के संरक्षण के लिए पक्का मन बनाया।
एएसआई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि पहले हमें फंड को लेकर काफी प्रॉब्लम रहती थी, इसी वजह से इन कब्रों की मरम्मत के बारे में कुछ भी तय नहीं हो पा रहा था। एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि हमने इस कब्रिस्तान का दौरा कर सभी कब्रों की स्थिति को देख लिया है। इनमें से कुछ कब्रों की मरम्मत का काम होगा और जरूरत पड़ने पर कुछ पत्थरों को बदला भी जाएगा।
हमारी पहली कोशिश यह रहेगी कि कब्रों या पिलर के जो हिस्से टूट गए हैं, उन्हें ही वापस लगाया जा सके, ताकि यह कब्रिस्तान अपने पुराने रूप में आ सके। पेड़ों के नीचे दबी कब्रों को बाहर निकाला जाएगा। पहले इस काम में खर्च होने वाले पैसे का हिसाब लगाया जाएगा और डिपार्टमेंट से अंतिम मंजूरी मिलने के बाद अगले महीने से हम काम शुरू कर देंगे।
बताया जाता है कि एक अंग्रेज अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल लोथियन केर स्कॉट के कार्यकाल के दौरान 1867 में ही इस कब्रिस्तान के पास मौजूद रेलवे ब्रिज का निर्माण हुआ था। इसी वजह से उनके नाम पर ही इस कब्रिस्तान और सड़क का नाम पड़ा। एक बेहद बड़े साइज में बना 'क्रॉस' का चिह्न इस कब्रिस्तान का मुख्य आकर्षण है। कहते हैं कि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान मारे गए अंग्रेजों की याद में इस ममॉरियल को बनाया गया था।
महरौली में मिली बलबन के जमाने की कब्र
रीतेश पुरोहित / १६ देक २००९

नई दिल्ली।। महरौली में बलबन के मकबरे पर संरक्षण का काम कर रहे आर्कियॉलजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) को यहां खुदाई के दौरान सैकड़ों साल पुराने अवशेष मिले हैं। इनमें 13वीं सदी के बलबन काल की एक कब्र भी शामिल है। इस बात के कयास लगाए जा रहे हैं कि यह कब्र गुलाम वंश के शासक गयासुद्दीन बलबन की हो सकती है। इसके अलावा एएसआई को यहां कुछ पिलर, चबूतरा, मिट्टी के बर्तन, तरकश और चौसर भी मिला है। एएसआई का कहना है कि अब इस बारे में पता किया जा रहा है कि ये अवशेष किस काल के हैं।
बलबन का मकबरा भारत और इस्लामिक वास्तुशास्त्र का मिलाजुला रूप है। बलबन एक तुर्किश विद्वान का बेटा था, लेकिन बचपन में मंगोलों ने उसे बेच दिया था। कुतुबुद्दीन ऐबक ने उसे आजाद कराया। उसने गुलाम वंश के ही शासक नासिरुद्दीन महमूद की बेटी से शादी की। नासिरीरुद्दीन का कोई बेटा न होने की वजह से उसकी मौत के बाद बलबन ने खुद को गुलाम वंश का शासक घोषित कर दिया। 1266 में गयासुद्दीन की पदवी के साथ उसने भारत की राजगद्दी संभाली और 1287 तक राज किया।

नई दिल्ली।। महरौली में बलबन के मकबरे पर संरक्षण का काम कर रहे आर्कियॉलजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) को यहां खुदाई के दौरान सैकड़ों साल पुराने अवशेष मिले हैं। इनमें 13वीं सदी के बलबन काल की एक कब्र भी शामिल है। इस बात के कयास लगाए जा रहे हैं कि यह कब्र गुलाम वंश के शासक गयासुद्दीन बलबन की हो सकती है। इसके अलावा एएसआई को यहां कुछ पिलर, चबूतरा, मिट्टी के बर्तन, तरकश और चौसर भी मिला है। एएसआई का कहना है कि अब इस बारे में पता किया जा रहा है कि ये अवशेष किस काल के हैं। एएसआई ने कॉमनवेल्थ गेम्स के मद्देनजर लोगों को दिल्ली की ऐतिहासिक विरासत दिखाने के लिए 46 स्मारकों को चुना है और वह इन जगहों पर संरक्षण का काम कर रहा है। महरौली के आर्कियॉलजिकल पार्क में मौजूद गुलाम वंश के शासक गयासुद्दीन बलबन के मकबरे का नाम भी इसमें शामिल है। हालांकि यहां इस मकबरे के अवशेष ही बचे हैं। सबसे पहले इंडियन नैशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) ने बलबन के मकबरे का संरक्षण किया था। इसके बाद एएसआई ने इसे अपने प्रोटेक्शन में ले लिया और यहां संरक्षण और मरम्मत का काम कराया। फिलहाल मकबरे के पूर्व में बलबन के बेटे खां शाहिद की एक कब्र मौजूद है।
एएसआई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि कॉमनवेल्थ गेम्स को ध्यान में रखते हुए हमने करीब चार महीने पहले बलबन के इस मकबरे पर काम शुरू किया था। हमने यहां 3 फुट से लेकर 12 फुट तक खुदाई की और हमें स्ट्रक्चर मिलने शुरू हो गए। हमें यहां एक कब्र मिली है। यह लाल पत्थर से बनी हुई है और इससे जाहिर होता है कि ये कब्र 13वीं शताब्दी यानी बलबन काल की है, क्योंकि उसी काल में लाल पत्थर का इस्तेमाल किया जाता था। हो सकता है कि यह कब्र बलबन की हो। हमें यहां कुछ पिलर भी मिले हैं और इन्हें देखकर लगता है कि यहां राजा का दरबार लगा करता था। बाकी अवशेषों के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता। अब इनकी कार्बन डेटिंग की जाएगी, जिससे पता चल सकेगा कि ये अवशेष किस काल के हैं। यह भी पता चल सकता है कि यह कब्र किसकी है। अधिकारी का कहना है कि खुदाई का काम लगभग पूरा हो चुका है और इसके बाद कंजर्वेशन का काम करेंगे और फिर ब्यूटीफिकेशन और लाइटिंग का काम किया जाएगा।
बलबन का मकबरा भारत और इस्लामिक वास्तुशास्त्र का मिलाजुला रूप है। बलबन एक तुर्किश विद्वान का बेटा था, लेकिन बचपन में मंगोलों ने उसे बेच दिया था। कुतुबुद्दीन ऐबक ने उसे आजाद कराया। उसने गुलाम वंश के ही शासक नासिरुद्दीन महमूद की बेटी से शादी की। नासिरीरुद्दीन का कोई बेटा न होने की वजह से उसकी मौत के बाद बलबन ने खुद को गुलाम वंश का शासक घोषित कर दिया। 1266 में गयासुद्दीन की पदवी के साथ उसने भारत की राजगद्दी संभाली और 1287 तक राज किया।क्या गेम्स तक मुक्त हो पाएगा बिजरी खान का मकबरा
रीतेश पुरोहित ।। नई दिल्ली / १ दिसम्बर २009
आरकेपुरम सेक्टर 3 के मेन रोड पर स्थित है 15वीं सदी का लोदी काल का बिजरी खान का मकबरा. इसे एक ओर से झुग्गी बस्ती ने अपनी चपेट में ले रखा है, दूसरी ओर एक पब्लिक टॉइलट है। यहां रह रहे लोगों ने इमारत के सामने बनी बाउंड्री पर एक लंबी दीवार खड़ी कर ली है। बगल में एक मंदिर है। बच्चों ने इसे खेल का मैदान बना लिया है, किसी ने कपड़े सुखाने की जगह और किसी ने आरामगाह। इस सबका खमियाजा भुगतना पड़ रहा है इस मकबरे को, जो कई जगह से टूट गया है। इसके पास ही एक टेनिस स्टेडियम है, जहां कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान टेनिस की प्रतियोगिताएं होंगी। यह स्मारक दिल्ली सरकार के आकिर्यॉलजी डिपार्टमंट की देखरेख में है। डिपार्टमंट इससे वाकिफ है, लेकिन फिलहाल खुद को बेबस बता रहा है।
यहां रह रहे लोगों को इसके बारे में कुछ नहीं पता। 35 साल के रविशंकर केवल इतना जानते हैं कि यह कोई गुंबद है। उनका कहना है हम यहां बीस साल से रह रहे हैं और हमें यहां से कोई हटाने नहीं आया। न तो हमें पानी की कोई प्रॉब्लम है और न ही बिजली की। स्थानीय लोगों का कहना है कि एक-दो हफ्ते में कोई कर्मचारी यहां आता है और साफ-सफाई कर चला जाता है।
सूत्रों का कहना है कि पहले लोगों ने इस मकबरे के अंदर कब्जा कर रखा था। बाद में उन्हें यहां से निकाला गया और इसे दोनों ओर से ताला लगाकर बंद किया गया। यहां एक साइनेज भी लगाया गया था, लेकिन लोगों ने इसे तोड़ दिया, जिसके बाद इसे मकबरे के अंदर ही रख दिया गया। दिल्ली सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि हमने ऐसे 20 स्मारकों को चुना है, जिन पर कॉमनवेल्थ गेम्स तक हर हाल में काम पूरा करना है। बिजरी खान का मकबरा इस लिस्ट में शामिल है और यह इसके महत्व को जाहिर करता है। उन्होंने बताया कि इस मकबरे के आसपास की जमीन लैंड ऐंड डिवेलपमंट ऑफिस के अधीन है। हम अवैध कब्जे को नहीं हटा सकते। पहले इस मकबरे को नोटिफाई किया जाएगा। इसके लिए हम लैंड एंड डिवेलपमेंट ऑफिस से संपर्क करेंगे और उनकी मदद से यहां अतिक्रमण हटाया जाएगा। फिर हम पूरी इमारत के संरक्षण का काम शुरू करेंगे।
इंडियन नैशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट ऐंड कल्चरल हेरिटेज के दिल्ली सर्कल के संयोजक ए. जी. के. मेनन का कहना है कि अभी तक यह मकबरा संरक्षित स्मारकों की लिस्ट में शामिल नहीं है। जब तक नोटिफिकेशन करके इसे कानून के दायरे में नहीं लाया जाता, हम कुछ नहीं कर सकते। एक बार नोटिफिकेशन हो जाता है, फिर सरकार से इसे अवैध कब्जे से मुक्त करने की अपील की जा सकती है।
इस ऐतिहासिक स्मारक के पास ही डीएलटीए टेनिस स्टेडियम हैं, जहां कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान टेनिस का आयोजन किया जाएगा। जाहिर सी बात है ऐसे में सड़क के बिल्कुल पास ही मौजूद इस स्मारक पर लोगों का ध्यान जरूर जाएगा। हेरिटेज एक्सर्पट्स का मानना है कि अगर इस ऐतिहासिक स्मारक का गेम्स तक ऐसा ही हाल रहता है तो लोगों की नजर में देश की छवि बेहद खराब बनेगी।
आरकेपुरम सेक्टर 3 के मेन रोड पर स्थित है 15वीं सदी का लोदी काल का बिजरी खान का मकबरा. इसे एक ओर से झुग्गी बस्ती ने अपनी चपेट में ले रखा है, दूसरी ओर एक पब्लिक टॉइलट है। यहां रह रहे लोगों ने इमारत के सामने बनी बाउंड्री पर एक लंबी दीवार खड़ी कर ली है। बगल में एक मंदिर है। बच्चों ने इसे खेल का मैदान बना लिया है, किसी ने कपड़े सुखाने की जगह और किसी ने आरामगाह। इस सबका खमियाजा भुगतना पड़ रहा है इस मकबरे को, जो कई जगह से टूट गया है। इसके पास ही एक टेनिस स्टेडियम है, जहां कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान टेनिस की प्रतियोगिताएं होंगी। यह स्मारक दिल्ली सरकार के आकिर्यॉलजी डिपार्टमंट की देखरेख में है। डिपार्टमंट इससे वाकिफ है, लेकिन फिलहाल खुद को बेबस बता रहा है।
यहां रह रहे लोगों को इसके बारे में कुछ नहीं पता। 35 साल के रविशंकर केवल इतना जानते हैं कि यह कोई गुंबद है। उनका कहना है हम यहां बीस साल से रह रहे हैं और हमें यहां से कोई हटाने नहीं आया। न तो हमें पानी की कोई प्रॉब्लम है और न ही बिजली की। स्थानीय लोगों का कहना है कि एक-दो हफ्ते में कोई कर्मचारी यहां आता है और साफ-सफाई कर चला जाता है।
सूत्रों का कहना है कि पहले लोगों ने इस मकबरे के अंदर कब्जा कर रखा था। बाद में उन्हें यहां से निकाला गया और इसे दोनों ओर से ताला लगाकर बंद किया गया। यहां एक साइनेज भी लगाया गया था, लेकिन लोगों ने इसे तोड़ दिया, जिसके बाद इसे मकबरे के अंदर ही रख दिया गया। दिल्ली सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि हमने ऐसे 20 स्मारकों को चुना है, जिन पर कॉमनवेल्थ गेम्स तक हर हाल में काम पूरा करना है। बिजरी खान का मकबरा इस लिस्ट में शामिल है और यह इसके महत्व को जाहिर करता है। उन्होंने बताया कि इस मकबरे के आसपास की जमीन लैंड ऐंड डिवेलपमंट ऑफिस के अधीन है। हम अवैध कब्जे को नहीं हटा सकते। पहले इस मकबरे को नोटिफाई किया जाएगा। इसके लिए हम लैंड एंड डिवेलपमेंट ऑफिस से संपर्क करेंगे और उनकी मदद से यहां अतिक्रमण हटाया जाएगा। फिर हम पूरी इमारत के संरक्षण का काम शुरू करेंगे।
इंडियन नैशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट ऐंड कल्चरल हेरिटेज के दिल्ली सर्कल के संयोजक ए. जी. के. मेनन का कहना है कि अभी तक यह मकबरा संरक्षित स्मारकों की लिस्ट में शामिल नहीं है। जब तक नोटिफिकेशन करके इसे कानून के दायरे में नहीं लाया जाता, हम कुछ नहीं कर सकते। एक बार नोटिफिकेशन हो जाता है, फिर सरकार से इसे अवैध कब्जे से मुक्त करने की अपील की जा सकती है।
इस ऐतिहासिक स्मारक के पास ही डीएलटीए टेनिस स्टेडियम हैं, जहां कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान टेनिस का आयोजन किया जाएगा। जाहिर सी बात है ऐसे में सड़क के बिल्कुल पास ही मौजूद इस स्मारक पर लोगों का ध्यान जरूर जाएगा। हेरिटेज एक्सर्पट्स का मानना है कि अगर इस ऐतिहासिक स्मारक का गेम्स तक ऐसा ही हाल रहता है तो लोगों की नजर में देश की छवि बेहद खराब बनेगी।
तोड़ दीं जफर महल की जालियां
रीतेश पुरोहित ।। नई दिल्ली
महरौली में ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह से सटा करीब 200 साल पुराना जफर महल जुआरियों और शराबियों का अड्डा तो सालों से बना ही है, अब बदमाशों ने मुगल काल के आखिरी दौर की इमारतों में शुमार इस महल की संगमरमर से बनी जालियां भी तोड़ डाली हैं।
दरगाह की देखरेख में जुटे लोगों का कहना है कि इस महल के हर कोने में लोग जुआ खेलते दिखाई दे जाएंगे। जुआ खेलने वाले दिन में तो बदमाश हाथी गेट से अंदर घुस जाते हैं, लेकिन रात में चौकीदार के ताला लगाकर चले जाने के बाद इन्हें अंदर घुसने में परेशानी होती थी। हालांकि दरगाह के पीछे से महल में जाने का रास्ता है, लेकिन इस रास्ते से महल में जाने के लिए जालियों को फांदकर जाना पड़ता था। इसलिए बदमाशों ने अपनी सहूलियत के लिए ये जालियां तोड़ डालीं। उन्होंने बताया कि हमने इस बारे में कई दिनों पहले ही पुलिस के पास शिकायत दर्ज करा दी थी, लेकिन कुछ नहीं हुआ। इससे दरगाह की सुरक्षा पर भी खतरा पैदा हो गया है।
दिल्ली की ऐतिहासिक इमारतें बचाने की मुहिम में जुटी संस्था हेरिटेज ऐंड कल्चरल फोरम की अध्यक्ष ऊषा कुमार का कहना है कि लाल पत्थर से बना जहाज महल मुगल शासन की अंतिम इमारतों में से एक है, जो मुगल स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है। इस लिहाज से तोड़ी गईं जालियां भी बेशकीमती थीं। उनका कहना है कि 1999 में हमने स्मारक बदहाली के मद्देनजर हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की थी, जिसके बाद कोर्ट ने महल के आसपास से अतिक्रमण हटाने और इसका अच्छी तरह संरक्षण करने का आदेश दिया था। लेकिन इसके बाद भी हालात में कोई बदलाव नहीं आया। मुगल शासक अकबर शाह द्वितीय ने 1842 में तीन मंजिला जफर महल का निर्माण कराया था, जिसका काफी हिस्सा अब टूट चुका है और अधिकतर जगह दीवारें ही बची हैं। अकबर शाह के बेटे और अंतिम मुगल शासक बहादुर शाह जफर ने विशाल हाथी गेट बनवाया था। बताया जाता है कि बहादुरशाह जफर ने इसे इतना बड़ा इसलिए बनवाया था, ताकि हाथी आसानी से उसके अंदर जा सके।
फिलहाल यह दोनों ही स्मारक आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की संरक्षित इमारतों की लिस्ट में शामिल हैं। एएसआई के वरिष्ठ अधिकारी इन जालियों के टूटने और यहां चल रहीं आपराधिक गतिविधियों से वाकिफ हैं, लेकिन इस ऐतिहासिक स्मारक को आपराधिक तत्वों से छुटकारा दिला पाने में खुद को मजबूर बताते हैं। एक सीनियर अधिकारी का कहना है कि हमने इस बारे में पुलिस में शिकायत की है। इस तरह के मामलों में कोई ऐक्शन के लिए हमें पुलिस पर ही डिपेंड रहना पड़ता है, क्योंकि हमारे पास इन बदमाशों से निपटने के लिए कोई और बंदोबस्त नहीं हैं। मुगल जमाने की जालियां वाकई बेशकीमती थीं, लेकिन अब हम जल्द ही नई जालियां लगा देंगे और वहां फेन्सिंग भी कर देंगे।
बहादुर शाह जफर हर साल शिकार के लिए जाते वक्त इस महल का इस्तेमाल करते थे। हर साल 'फूल वालों की सैर' उत्सव के दौरान उनको इसी महल में सम्मानित किया जाता था।
महरौली में ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह से सटा करीब 200 साल पुराना जफर महल जुआरियों और शराबियों का अड्डा तो सालों से बना ही है, अब बदमाशों ने मुगल काल के आखिरी दौर की इमारतों में शुमार इस महल की संगमरमर से बनी जालियां भी तोड़ डाली हैं।
दरगाह की देखरेख में जुटे लोगों का कहना है कि इस महल के हर कोने में लोग जुआ खेलते दिखाई दे जाएंगे। जुआ खेलने वाले दिन में तो बदमाश हाथी गेट से अंदर घुस जाते हैं, लेकिन रात में चौकीदार के ताला लगाकर चले जाने के बाद इन्हें अंदर घुसने में परेशानी होती थी। हालांकि दरगाह के पीछे से महल में जाने का रास्ता है, लेकिन इस रास्ते से महल में जाने के लिए जालियों को फांदकर जाना पड़ता था। इसलिए बदमाशों ने अपनी सहूलियत के लिए ये जालियां तोड़ डालीं। उन्होंने बताया कि हमने इस बारे में कई दिनों पहले ही पुलिस के पास शिकायत दर्ज करा दी थी, लेकिन कुछ नहीं हुआ। इससे दरगाह की सुरक्षा पर भी खतरा पैदा हो गया है।
दिल्ली की ऐतिहासिक इमारतें बचाने की मुहिम में जुटी संस्था हेरिटेज ऐंड कल्चरल फोरम की अध्यक्ष ऊषा कुमार का कहना है कि लाल पत्थर से बना जहाज महल मुगल शासन की अंतिम इमारतों में से एक है, जो मुगल स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है। इस लिहाज से तोड़ी गईं जालियां भी बेशकीमती थीं। उनका कहना है कि 1999 में हमने स्मारक बदहाली के मद्देनजर हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की थी, जिसके बाद कोर्ट ने महल के आसपास से अतिक्रमण हटाने और इसका अच्छी तरह संरक्षण करने का आदेश दिया था। लेकिन इसके बाद भी हालात में कोई बदलाव नहीं आया। मुगल शासक अकबर शाह द्वितीय ने 1842 में तीन मंजिला जफर महल का निर्माण कराया था, जिसका काफी हिस्सा अब टूट चुका है और अधिकतर जगह दीवारें ही बची हैं। अकबर शाह के बेटे और अंतिम मुगल शासक बहादुर शाह जफर ने विशाल हाथी गेट बनवाया था। बताया जाता है कि बहादुरशाह जफर ने इसे इतना बड़ा इसलिए बनवाया था, ताकि हाथी आसानी से उसके अंदर जा सके।
फिलहाल यह दोनों ही स्मारक आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की संरक्षित इमारतों की लिस्ट में शामिल हैं। एएसआई के वरिष्ठ अधिकारी इन जालियों के टूटने और यहां चल रहीं आपराधिक गतिविधियों से वाकिफ हैं, लेकिन इस ऐतिहासिक स्मारक को आपराधिक तत्वों से छुटकारा दिला पाने में खुद को मजबूर बताते हैं। एक सीनियर अधिकारी का कहना है कि हमने इस बारे में पुलिस में शिकायत की है। इस तरह के मामलों में कोई ऐक्शन के लिए हमें पुलिस पर ही डिपेंड रहना पड़ता है, क्योंकि हमारे पास इन बदमाशों से निपटने के लिए कोई और बंदोबस्त नहीं हैं। मुगल जमाने की जालियां वाकई बेशकीमती थीं, लेकिन अब हम जल्द ही नई जालियां लगा देंगे और वहां फेन्सिंग भी कर देंगे।
बहादुर शाह जफर हर साल शिकार के लिए जाते वक्त इस महल का इस्तेमाल करते थे। हर साल 'फूल वालों की सैर' उत्सव के दौरान उनको इसी महल में सम्मानित किया जाता था।
प्रतिकूल भाग्य के लिए भी हम ही होते हैं जिम्मेदार
रीतेश पुरोहित / १३ मई २००९
पिछले दिनों इंटरनेट पर मुझे स्टीफन कॉव का एक लेख पढ़ने को मिला। कॉव पश्चिम के प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु हैं, जो लोगों का अपनी भावनाओं पर नियंत्रण करना, अपनी वृत्तियों को नए तरह से समझना और जीने का सलीका सिखाते हैं।
स्टीफन कॉव का जो लेख मैं ने पढ़ा उसमें उन्होंने यह बताने की कोशिश की है कि किस तरह अपनी जिंदगी की 90 प्रतिशत घटनाओं की वजह हम स्वयं होते हैं। आम तौर पर कहा यह जाता है कि जिंदगी की ज्यादातर बातों या घटनाओं पर हमारा कोई अख्तियार नहीं होता। गीता में तो यहां तक कहा गया है कि फल की चिंता मत करो क्योंकि फल पर भी तुम्हारा अख्तियार नहीं है। सिर्फ कर्म करो, सिर्फ अपना कर्म क्योंकि वही एक ऐसी चीज है जो पूरी तरह से तुम्हारे वश में है।
लेकिन स्टीफन कॉव ने अपने लेख में इससे बिल्कुल अलग व्याख्या प्रस्तुत की है। वे कहते हैं कि अपने जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों (90 प्रतिशत) के लिए भी हम खुद ही जिम्मेदार होते हैं। यह विचार मुझे अच्छा लगा और कुछ अलग भी, इसलिए इसे आपके साथ बांटना चाहता हूं।
स्टीफन कॉव लिखते हैं कि हम अपनी लाइफ में होने वाली 10 प्रतिशत घटनाओं को नियंत्रित नहीं कर सकते, लेकिन किसी एक घटना के बाद दिन भर होने वाली 90 फीसदी चीजों को नियंत्रित कर सकते हैं। जैसे आप ट्रैफिक में रेड लाइट को कंट्रोल नहीं कर सकते, लेकिन उसके बाद से होने वाले अपने रिएक्शन को कर सकते हैं, जो रिएक् शन आपके दिन के बाकी के घंटों के लिए काफी हद तक जिम्मेदार होते हैं।
स्टीफर एक उदाहरण देते हैं। सोचिए कि आप अपनी फैमिली के साथ ब्रेकफास्ट कर रहे हैं। बगल में बैठी बेटी आपकी शर्ट पर कॉफी गिरा देती है। आप गुस्से से आगबबूला हो जाते हैं और बेटी को जोर से डांट देते हैं। वह रोने लगती है। अब गुस्से का शिकार होती हैं अपनी पत्नी। आप शिकायत करते हैं कि कप टेबल के सिरे पर रखा हुआ था, इसी वजह से वह गिरा। इसके बाद दोनों ओर से तीखी बहस होती है। आखिरकार आप ऊपर के कमरे में जाते हैं और शर्ट चेंज करते हैं। वापस आकर देखते हैं कि बेटी अभी तक रो रही है और उसने अपना ब्रेकफास्ट खत्म नहीं किया है। उसकी स्कूल बस छूट गई है।
उधर, आपकी पत्नी को भी तुरंत ऑफिस के लिए निकलना है। इसके बाद आप कार निकालते हैं। चूंकि आप भी लेट हो चुके हैं, इसलिए 30 किमी/घंटा स्पीड लिमिट वाली सड़क पर 40 की स्पीड से गाड़ी चलाते हैं। नतीजतन ट्रैफिक फाइन के तौर पर पांच सौ रुपये चुकाने होते हैं और 15 मिनट की देरी से आप स्कूल पहुंचते हैं। बेटी गाड़ी से उतरकर आपसे बिना कुछ कहे स्कूल चली जाती है।
अंत में आप भी बीस मिनट लेट होकर ही अपने ऑफिस पहुंचते हैं। पता चलता है कि ब्रीफकेस तो आप घर पर ही भूल गए हैं। शाम को आप घर पहुंचते हैं। लेकिन पत्नी और बेटी आपसे बात नहीं करते।
मतलब आपके दिन की शुरुआत बुरी हुई और पूरा दिन ही खराब हो गया। इसके लिए आप किसे दोषी मानते हैं? कॉफी को, बेटी को, पुलिसवाले को या खुद को। जाहिर है इस सबके लिए आप खुद ही जिम्मेदार हैं। आप चाहते तो एक बुरी घटना से अपना पूरा दिन खराब होने से बचा सकते थे। कॉफी गिरने के बाद आप गुस्से पर काबू रखते हुए बेटी को समझाते और उसे आगे से सावधानी बरतने के लिए कहते। ब्रीफकेस से शर्ट निकालने के बाद समय पर नीचे आते। आपकी बेटी समय पर तैयार हो चुकी होती। वह खुशी-खुशी आपसे विदा लेती और आसानी से बस पकड़ लेती। आप 5 मिनट पहले ऑफिस पहुंचते और जोश के साथ अपने सहयोगियों से मिलते। आपका बॉस भी यह अंदाज देखकर खुश हो जाता।
अंतर देखिए। एक घटना। दो अलग रिएक्शन। नतीजे में जमीन-आसमान का फर्क। यानी यदि किसी भी घटना पर आप सोच समझकर और ठंडे दिमाग से कोई रिएक्शन देते हैं तो यह आप कई तरह की परेशानियों से बच सकते हैं।
पिछले दिनों इंटरनेट पर मुझे स्टीफन कॉव का एक लेख पढ़ने को मिला। कॉव पश्चिम के प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु हैं, जो लोगों का अपनी भावनाओं पर नियंत्रण करना, अपनी वृत्तियों को नए तरह से समझना और जीने का सलीका सिखाते हैं।
स्टीफन कॉव का जो लेख मैं ने पढ़ा उसमें उन्होंने यह बताने की कोशिश की है कि किस तरह अपनी जिंदगी की 90 प्रतिशत घटनाओं की वजह हम स्वयं होते हैं। आम तौर पर कहा यह जाता है कि जिंदगी की ज्यादातर बातों या घटनाओं पर हमारा कोई अख्तियार नहीं होता। गीता में तो यहां तक कहा गया है कि फल की चिंता मत करो क्योंकि फल पर भी तुम्हारा अख्तियार नहीं है। सिर्फ कर्म करो, सिर्फ अपना कर्म क्योंकि वही एक ऐसी चीज है जो पूरी तरह से तुम्हारे वश में है।
लेकिन स्टीफन कॉव ने अपने लेख में इससे बिल्कुल अलग व्याख्या प्रस्तुत की है। वे कहते हैं कि अपने जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों (90 प्रतिशत) के लिए भी हम खुद ही जिम्मेदार होते हैं। यह विचार मुझे अच्छा लगा और कुछ अलग भी, इसलिए इसे आपके साथ बांटना चाहता हूं।
स्टीफन कॉव लिखते हैं कि हम अपनी लाइफ में होने वाली 10 प्रतिशत घटनाओं को नियंत्रित नहीं कर सकते, लेकिन किसी एक घटना के बाद दिन भर होने वाली 90 फीसदी चीजों को नियंत्रित कर सकते हैं। जैसे आप ट्रैफिक में रेड लाइट को कंट्रोल नहीं कर सकते, लेकिन उसके बाद से होने वाले अपने रिएक्शन को कर सकते हैं, जो रिएक् शन आपके दिन के बाकी के घंटों के लिए काफी हद तक जिम्मेदार होते हैं।
स्टीफर एक उदाहरण देते हैं। सोचिए कि आप अपनी फैमिली के साथ ब्रेकफास्ट कर रहे हैं। बगल में बैठी बेटी आपकी शर्ट पर कॉफी गिरा देती है। आप गुस्से से आगबबूला हो जाते हैं और बेटी को जोर से डांट देते हैं। वह रोने लगती है। अब गुस्से का शिकार होती हैं अपनी पत्नी। आप शिकायत करते हैं कि कप टेबल के सिरे पर रखा हुआ था, इसी वजह से वह गिरा। इसके बाद दोनों ओर से तीखी बहस होती है। आखिरकार आप ऊपर के कमरे में जाते हैं और शर्ट चेंज करते हैं। वापस आकर देखते हैं कि बेटी अभी तक रो रही है और उसने अपना ब्रेकफास्ट खत्म नहीं किया है। उसकी स्कूल बस छूट गई है।
उधर, आपकी पत्नी को भी तुरंत ऑफिस के लिए निकलना है। इसके बाद आप कार निकालते हैं। चूंकि आप भी लेट हो चुके हैं, इसलिए 30 किमी/घंटा स्पीड लिमिट वाली सड़क पर 40 की स्पीड से गाड़ी चलाते हैं। नतीजतन ट्रैफिक फाइन के तौर पर पांच सौ रुपये चुकाने होते हैं और 15 मिनट की देरी से आप स्कूल पहुंचते हैं। बेटी गाड़ी से उतरकर आपसे बिना कुछ कहे स्कूल चली जाती है।
अंत में आप भी बीस मिनट लेट होकर ही अपने ऑफिस पहुंचते हैं। पता चलता है कि ब्रीफकेस तो आप घर पर ही भूल गए हैं। शाम को आप घर पहुंचते हैं। लेकिन पत्नी और बेटी आपसे बात नहीं करते।
मतलब आपके दिन की शुरुआत बुरी हुई और पूरा दिन ही खराब हो गया। इसके लिए आप किसे दोषी मानते हैं? कॉफी को, बेटी को, पुलिसवाले को या खुद को। जाहिर है इस सबके लिए आप खुद ही जिम्मेदार हैं। आप चाहते तो एक बुरी घटना से अपना पूरा दिन खराब होने से बचा सकते थे। कॉफी गिरने के बाद आप गुस्से पर काबू रखते हुए बेटी को समझाते और उसे आगे से सावधानी बरतने के लिए कहते। ब्रीफकेस से शर्ट निकालने के बाद समय पर नीचे आते। आपकी बेटी समय पर तैयार हो चुकी होती। वह खुशी-खुशी आपसे विदा लेती और आसानी से बस पकड़ लेती। आप 5 मिनट पहले ऑफिस पहुंचते और जोश के साथ अपने सहयोगियों से मिलते। आपका बॉस भी यह अंदाज देखकर खुश हो जाता।
अंतर देखिए। एक घटना। दो अलग रिएक्शन। नतीजे में जमीन-आसमान का फर्क। यानी यदि किसी भी घटना पर आप सोच समझकर और ठंडे दिमाग से कोई रिएक्शन देते हैं तो यह आप कई तरह की परेशानियों से बच सकते हैं।
दोस्त है टेक्नॉलजी
रीतेश पुरोहित/ २ जनवरी 2010
ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो हर नई तकनीक को संदेह की नजर से देखते हैं। उनमें से कई यह कहते मिल जाएंगे कि इंटरनेट ने नई पीढ़ी को बर्बाद कर दिया है। क्या सचमुच ऐसा है? मुझे एक घटना याद आती है। पिछले साल सर्दी के मौसम में ही एक दिन सुबह-सुबह अचानक मेरा मोबाइल बजा।
ममी का कॉल था। वह काफी परेशान लग रही थीं। पूछने पर बताया कि दो दिन से राहुल (मेरा बड़ा भाई) का फोन नहीं आया है और कई बार कोशिश करने के बाद भी उसका फोन नहीं लग रहा है। मैं सन्न रह गया। भैया उस वक्त इलाहाबाद में पढ़ाई कर रहा था। वह मुझे भी लगभग हर रोज कॉल कर लेता था, लेकिन याद आया कि मेरी भी उससे दो दिनों से बात नहीं हुई है। मैंने ममी को दिलासा दी और समझाया कि वो कहीं बिजी होगा या उसके मोबाइल में कोई खराबी आ गई होगी। मैंने ममी को समझा तो दिया, लेकिन खुद चिंता में पड़ गया। मैं तो दो-तीन दिनों के अंतराल पर घर फोन किया करता था, लेकिन वह ममी-पापा को फोन करना नहीं भूलता था।
मैंने उसे तुरंत कॉल किया, लेकिन कॉल कनेक्ट ही नहीं हो रहा था। मेरे पास उसके किसी दोस्त का नंबर नहीं था और इलाहाबाद में न तो हमारा कोई रिश्तेदार था और न मैं वहां किसी को जानता था। मैंने कई बार उसके दोस्त का कॉन्टेक्ट नंबर लेने के बारे में सोचा, लेकिन जब भी उससे बात होती, भूल जाता। उस दिन मैं पछता रहा था कि मैंने इतनी बड़ी लापरवाही क्यों की? मैंने अपने रूममेट्स को भी यह बात बताई। हम सब सोच में पड़ गए। चिंता बढ़ती जा रही थी और कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। अचानक आइडिया आया कि क्यों न उसे ई-मेल कर दूं, लेकिन मुश्किल यह थी कि वो नेट पर ऑनलाइन कब होगा। कब वो मेरा ई-मेल देखेगा और कब वो घर पर कॉल करेगा। फिर दिमाग में आया कि उसकी ऑर्कुट प्रोफाइल पर इलाहाबाद के कई फ्रेंड्स होंगे। ऑर्कुट के जरिए उसके किसी दोस्त का मोबाइल नंबर मिल सकता है।
मैं उसके दोस्त को फोन करके भैया का हालचाल पूछ सकता हूं। यही सोचकर मैं इंटरनेट कैफे पर गया। वहां जाकर भैया की फ्रेंड लिस्ट खंगाल ही रहा था कि अचानक उसका फोन आ गया। उसने बताया कि उसके सिमकार्ड की वैलिडिटी खत्म हो गई थी और उसकी यूनिवर्सिटी के आसपास मोबाइल रिचार्ज की कोई दुकान नहीं थी, इसलिए वो किसी को कॉल नहीं कर पाया। उससे बात करके मेरी जान में जान आई। हालांकि ऑर्कुट से कोई मदद मिलने से पहले ही उसका फोन आ गया, लेकिन तब अहसास हुआ कि एक सोशल नेटवर्किंग साइट की अहमियत क्या है। हमारी पीढ़ी टेक्नॉलजी के साथ ही आगे बढ़ी है इसलिए हम उसी की आंख से अपने जीवन को देखते हैं और अपना रास्ता ढूंढते हैं। तभी तो अपने भाई से कॉन्टेक्ट करने के लिए ऑर्कुट ही मुझे एकमात्र विकल्प नजर आया।
ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो हर नई तकनीक को संदेह की नजर से देखते हैं। उनमें से कई यह कहते मिल जाएंगे कि इंटरनेट ने नई पीढ़ी को बर्बाद कर दिया है। क्या सचमुच ऐसा है? मुझे एक घटना याद आती है। पिछले साल सर्दी के मौसम में ही एक दिन सुबह-सुबह अचानक मेरा मोबाइल बजा।
ममी का कॉल था। वह काफी परेशान लग रही थीं। पूछने पर बताया कि दो दिन से राहुल (मेरा बड़ा भाई) का फोन नहीं आया है और कई बार कोशिश करने के बाद भी उसका फोन नहीं लग रहा है। मैं सन्न रह गया। भैया उस वक्त इलाहाबाद में पढ़ाई कर रहा था। वह मुझे भी लगभग हर रोज कॉल कर लेता था, लेकिन याद आया कि मेरी भी उससे दो दिनों से बात नहीं हुई है। मैंने ममी को दिलासा दी और समझाया कि वो कहीं बिजी होगा या उसके मोबाइल में कोई खराबी आ गई होगी। मैंने ममी को समझा तो दिया, लेकिन खुद चिंता में पड़ गया। मैं तो दो-तीन दिनों के अंतराल पर घर फोन किया करता था, लेकिन वह ममी-पापा को फोन करना नहीं भूलता था।
मैंने उसे तुरंत कॉल किया, लेकिन कॉल कनेक्ट ही नहीं हो रहा था। मेरे पास उसके किसी दोस्त का नंबर नहीं था और इलाहाबाद में न तो हमारा कोई रिश्तेदार था और न मैं वहां किसी को जानता था। मैंने कई बार उसके दोस्त का कॉन्टेक्ट नंबर लेने के बारे में सोचा, लेकिन जब भी उससे बात होती, भूल जाता। उस दिन मैं पछता रहा था कि मैंने इतनी बड़ी लापरवाही क्यों की? मैंने अपने रूममेट्स को भी यह बात बताई। हम सब सोच में पड़ गए। चिंता बढ़ती जा रही थी और कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। अचानक आइडिया आया कि क्यों न उसे ई-मेल कर दूं, लेकिन मुश्किल यह थी कि वो नेट पर ऑनलाइन कब होगा। कब वो मेरा ई-मेल देखेगा और कब वो घर पर कॉल करेगा। फिर दिमाग में आया कि उसकी ऑर्कुट प्रोफाइल पर इलाहाबाद के कई फ्रेंड्स होंगे। ऑर्कुट के जरिए उसके किसी दोस्त का मोबाइल नंबर मिल सकता है।
मैं उसके दोस्त को फोन करके भैया का हालचाल पूछ सकता हूं। यही सोचकर मैं इंटरनेट कैफे पर गया। वहां जाकर भैया की फ्रेंड लिस्ट खंगाल ही रहा था कि अचानक उसका फोन आ गया। उसने बताया कि उसके सिमकार्ड की वैलिडिटी खत्म हो गई थी और उसकी यूनिवर्सिटी के आसपास मोबाइल रिचार्ज की कोई दुकान नहीं थी, इसलिए वो किसी को कॉल नहीं कर पाया। उससे बात करके मेरी जान में जान आई। हालांकि ऑर्कुट से कोई मदद मिलने से पहले ही उसका फोन आ गया, लेकिन तब अहसास हुआ कि एक सोशल नेटवर्किंग साइट की अहमियत क्या है। हमारी पीढ़ी टेक्नॉलजी के साथ ही आगे बढ़ी है इसलिए हम उसी की आंख से अपने जीवन को देखते हैं और अपना रास्ता ढूंढते हैं। तभी तो अपने भाई से कॉन्टेक्ट करने के लिए ऑर्कुट ही मुझे एकमात्र विकल्प नजर आया।
टेंशन फ्री होकर कर सकेंगे कुतुब की सैर
रीतेश पुरोहित / २१ मार्च २०१०
नई दिल्ली।। दुनियाभर से हजारों लोग हर रोज कुतुब मीनार देखने आते हैं, लेकिन यह देखकर निराश हो जाते हैं कि इस वर्ल्ड हेरिटेज साइट पर टूरिस्टों के लिए बेसिक फैसिलिटीज का भी अभाव है। यहां कोई कैंटीन नहीं है, टॉइलेट ब्लॉक ठीक नहीं हैं और पार्किंग के लिए पर्याप्त जगह नहीं है। हालांकि अब आर्कियॉलजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) जल्द ही टूरिस्टों की इन शिकायतों को दूर करेगा। यहां एक नई कैंटीन खोलने के अलावा पार्किंग और टॉइलेट व्यवस्था को भी दुरुस्त करने की तैयारी है। उम्मीद है कि कॉमनवेल्थ गेम्स तक यह काम पूरा कर लिया जाएगा।
गुलाम वंश के शासक कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा बनाई गई यह मीनार न सिर्फ दिल्ली बल्कि भारत के सबसे पसंदीदा टूरिस्ट प्लेस में से एक है। 39 लाख टूरिस्टों की संख्या के साथ 2006 में यह भारत के सबसे ज्यादा देखे जाने वाले स्मारकों की लिस्ट में पहले नंबर पर थी। इस सबके बावजूद यहां टूरिस्ट पीने के पानी के लिए भी बाहर लगी रेहडि़यों पर ही डिपेंड हैं, जो यहां दोगुने रेट पर लोगों को पानी देते हैं।
इन रेहडि़यों का पानी कितना सेफ हैं, कोई नहीं जानता। खुद एएसआई अधिकारी भी इस बात को मानते हैं। उनका कहना है कि हमने आज तक नहीं देखा कि किसी एमसीडी के अधिकारी ने इन कियोस्क के पानी की जांच की हो। हमने इसके लिए कई बार एमसीडी के अधिकारियों से शिकायत भी की, लेकिन कुछ नहीं हुआ। लोग नाश्ते या खाने के लिए भी पास ही मौजूद ऐसी दुकानों और रेहडि़यों का रुख करते हैं।
हालांकि कुतुब कॉम्प्लेक्स में दो टॉइलेट्स हैं, लेकिन टिकट काउंटर के पास मौजूद टॉइलेट ब्लॉक बहुत छोटे हैं। कैंटीन के लिए एक जगह रिजर्व है, लेकिन यह हमेशा बंद रहती है। एएसआई अधिकारी ने बताया कि कुछ साल पहले इंडियन टूरिजम डिवेलपमेंट कॉर्पोरेशन (आईटीडीसी) ने यह टॉइलेट और कैंटीन बनवाई थीं। इस छोटी कैंटीन में इतनी जगह ही नहीं है कि वहां सारा खाने-पीने का सामान रखा जा सके या कुछ पकाया जा सके, इसलिए इस कैंटीन को खोला ही नहीं गया। हालांकि अब हम इस कैंटीन का स्पेस बढ़ाएंगे। इससे लोगों को अच्छे फूड आइटम्स मिल सकेंगे।
एएसआई के एक आला अधिकारी ने बताया कि कुतुब मीनार की पार्किंग में फिलहाल 50-60 गाड़ियों के लिए जगह है, लेकिन वीक एंड या छुट्टियों के दौरान भीड़ ज्यादा होने की स्थिति में गाड़ी पार्क करने की बहुत बड़ी समस्या पैदा हो जाती है।
ऐसे में इस पार्किंग स्पेस को बढ़ाया जाएगा। नई पार्किंग में टू-वीलर, कार, बस के लिए पार्किंग की जगह अलग-अलग होगी। विकलांगों के लिए अलग से व्यवस्था होगी। उन्होंने बताया कि पार्किंग और टॉइलेट्स बनाने के बारे में सभी औपचारिकताएं पूरी कर ली गई हैं। उम्मीद है कि जल्द ही यहां काम शुरू हो जाएगा।
नई दिल्ली।। दुनियाभर से हजारों लोग हर रोज कुतुब मीनार देखने आते हैं, लेकिन यह देखकर निराश हो जाते हैं कि इस वर्ल्ड हेरिटेज साइट पर टूरिस्टों के लिए बेसिक फैसिलिटीज का भी अभाव है। यहां कोई कैंटीन नहीं है, टॉइलेट ब्लॉक ठीक नहीं हैं और पार्किंग के लिए पर्याप्त जगह नहीं है। हालांकि अब आर्कियॉलजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) जल्द ही टूरिस्टों की इन शिकायतों को दूर करेगा। यहां एक नई कैंटीन खोलने के अलावा पार्किंग और टॉइलेट व्यवस्था को भी दुरुस्त करने की तैयारी है। उम्मीद है कि कॉमनवेल्थ गेम्स तक यह काम पूरा कर लिया जाएगा।
गुलाम वंश के शासक कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा बनाई गई यह मीनार न सिर्फ दिल्ली बल्कि भारत के सबसे पसंदीदा टूरिस्ट प्लेस में से एक है। 39 लाख टूरिस्टों की संख्या के साथ 2006 में यह भारत के सबसे ज्यादा देखे जाने वाले स्मारकों की लिस्ट में पहले नंबर पर थी। इस सबके बावजूद यहां टूरिस्ट पीने के पानी के लिए भी बाहर लगी रेहडि़यों पर ही डिपेंड हैं, जो यहां दोगुने रेट पर लोगों को पानी देते हैं।
इन रेहडि़यों का पानी कितना सेफ हैं, कोई नहीं जानता। खुद एएसआई अधिकारी भी इस बात को मानते हैं। उनका कहना है कि हमने आज तक नहीं देखा कि किसी एमसीडी के अधिकारी ने इन कियोस्क के पानी की जांच की हो। हमने इसके लिए कई बार एमसीडी के अधिकारियों से शिकायत भी की, लेकिन कुछ नहीं हुआ। लोग नाश्ते या खाने के लिए भी पास ही मौजूद ऐसी दुकानों और रेहडि़यों का रुख करते हैं।
हालांकि कुतुब कॉम्प्लेक्स में दो टॉइलेट्स हैं, लेकिन टिकट काउंटर के पास मौजूद टॉइलेट ब्लॉक बहुत छोटे हैं। कैंटीन के लिए एक जगह रिजर्व है, लेकिन यह हमेशा बंद रहती है। एएसआई अधिकारी ने बताया कि कुछ साल पहले इंडियन टूरिजम डिवेलपमेंट कॉर्पोरेशन (आईटीडीसी) ने यह टॉइलेट और कैंटीन बनवाई थीं। इस छोटी कैंटीन में इतनी जगह ही नहीं है कि वहां सारा खाने-पीने का सामान रखा जा सके या कुछ पकाया जा सके, इसलिए इस कैंटीन को खोला ही नहीं गया। हालांकि अब हम इस कैंटीन का स्पेस बढ़ाएंगे। इससे लोगों को अच्छे फूड आइटम्स मिल सकेंगे।
एएसआई के एक आला अधिकारी ने बताया कि कुतुब मीनार की पार्किंग में फिलहाल 50-60 गाड़ियों के लिए जगह है, लेकिन वीक एंड या छुट्टियों के दौरान भीड़ ज्यादा होने की स्थिति में गाड़ी पार्क करने की बहुत बड़ी समस्या पैदा हो जाती है।
ऐसे में इस पार्किंग स्पेस को बढ़ाया जाएगा। नई पार्किंग में टू-वीलर, कार, बस के लिए पार्किंग की जगह अलग-अलग होगी। विकलांगों के लिए अलग से व्यवस्था होगी। उन्होंने बताया कि पार्किंग और टॉइलेट्स बनाने के बारे में सभी औपचारिकताएं पूरी कर ली गई हैं। उम्मीद है कि जल्द ही यहां काम शुरू हो जाएगा।
Monday, March 1, 2010
कुतुब की बावली : यह हेरिटेज भी बेहाल
८ फरवरी २०१०
रीतेश पुरोहित ।। नई दिल्ली
मुख्यमंत्री शीला दीक्षित यह तो मानती हैं कि दिल्ली के जल सोतों को भी विरासत के तौर पर देखा जाना चाहिए, लेकिन कई ऐतिहासिक इमारतों की तरह ये जल सोत भी खत्म हो चुके हैं या खत्म होने के कगार पर हैं। महरौली में ख्वाजा कुतुबुदृदीन बख्तियार काकी की दरगाह परिसर में मौजूद सैकड़ों साल पुरानी कुतुब की बावली की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। वैसे तो यह बावली गुलाम वंश के जमाने की है, लेकिन न तो इसे एएसआई का संरक्षण हासिल है और न ही दिल्ली सरकार के आर्कियॉलजी डिपार्टमेंट का। 2003 में यह बावली डीडीए के पास थी, उसके बाद वक्फ बोर्ड ने इसे अपनी संपत्ति माना, लेकिन इसे बचाने में किसी ने दिलचस्पी नहीं दिखाई। नतीजतन आसपास की गंदगी इस बावली में फेंकी जा रही है और अब यह अपनी अंतिम सांसें गिन रही है।
महरौली में ख्वाजा बख्तियार काकी की मजार पर रोज सैकड़ों लोग मत्था टेकने आते हैं, लेकिन यहां मौजूद बावली के बारे में कम ही लोगों को पता है। कुछ साल पहले तक इस बावली में पानी था, लेकिन अब यह पूरी तरह सूख चुकी है। फिलहाल यह बंद है और लोगों को इसके नीचे जाने की इजाजत नहीं है। करीब आठ साल पहले दिल्ली हाई कोर्ट में पेश की गई लिस्ट में डीडीए को इस बावली का केयरटेकर बताया गया था, लेकिन इसके एक साल बाद हाई कोर्ट में पेश की गई रिवाइज्ड लिस्ट में इस बावली को दिल्ली वक्फ बोर्ड की लिस्ट में दिखाया गया। सूत्रों का कहना है कि दरगाह से जुड़े सारे मसलों की देखरेख के लिए नियुक्त वक्फ बोर्ड की कमिटी भी मानती है कि लोगों ने इस बावली को कूड़ा फेंकने की जगह में तब्दील कर दिया है। कमिटी के मैनेजर फैजान अहमद मानते हैं कि इस बावली की साफ-सफाई की जिम्मेदारी कमिटी की है, लेकिन उनका कहना है कि अगर हम खुद यह काम करवाते हैं तो हमें आसपास के लोगों का विरोध झेलना पड़ सकता है। हम नहीं चाहते कि इस पवित्र जगह पर कोई ऐसी वैसी हरकत हो, इसलिए इसके लिए हम एमसीडी को कई बार पत्र लिख चुके हैं।
दिल्ली में जल सोतों को बचाने की मुहिम से लंबे समय से जुड़े विनोद जैन बताते हैं कि हाई कोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा था कि कोई भी जल सोत जैसे तालाब, झील, बावली आदि की सफाई की जिम्मेदारी उसी एजेंसी की होगी, जिसकी जमीन पर वह जल स्रोत मौजूद है। अगर कोई इसके पीछे अपनी मजबूरी बताता है, तो इसका मतलब यह हुआ कि वह अपनी जिम्मेदारी से बच रहा है। जल सोत से जुड़े इस पूरे मसले के लिए हाई कोर्ट ने एक मॉनिटरिंग कमिटी का गठन किया था और दिल्ली सरकार के चीफ सेक्रेटरी राकेश मेहता को इसका अध्यक्ष बनाया था। विनोद का कहना है कि अगर वक्फ बोर्ड वाकई इस बावली को बचाना चाहता है, तो वह इस बारे में दिल्ली सरकार के चीफ सेक्रेटरी से संपर्क क्यों नहीं करता। उनका कहना है कि दिल्ली के इन जल सोतों से जुड़ी एजेंसियां एक तरफ तो उन्हें अपने हाथ से खोना भी नहीं चाहतीं और दूसरी तरफ उनको बचाने की कोशिश भी नहीं करतीं।
मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने एक हफ्ते पहले ही इंटैक के एक कार्यक्रम में कहा था कि दिल्ली के जल सोत भी हमारी विरासत हैं और उन्हें भी ऐतिहासिक धरोहर के तौर पर देखा जाना चाहिए। दिल्ली में कुआं, तालाब, बावली समेत 629 जल सोत हैं। इनमें से 15 एएसआई के पास, डीडीए के पास 118, दिल्ली सरकार के पास 469 व सीपीडब्ल्यूडी और पीडब्ल्यूडी के पास 4-4 हैं।
रीतेश पुरोहित ।। नई दिल्ली
मुख्यमंत्री शीला दीक्षित यह तो मानती हैं कि दिल्ली के जल सोतों को भी विरासत के तौर पर देखा जाना चाहिए, लेकिन कई ऐतिहासिक इमारतों की तरह ये जल सोत भी खत्म हो चुके हैं या खत्म होने के कगार पर हैं। महरौली में ख्वाजा कुतुबुदृदीन बख्तियार काकी की दरगाह परिसर में मौजूद सैकड़ों साल पुरानी कुतुब की बावली की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। वैसे तो यह बावली गुलाम वंश के जमाने की है, लेकिन न तो इसे एएसआई का संरक्षण हासिल है और न ही दिल्ली सरकार के आर्कियॉलजी डिपार्टमेंट का। 2003 में यह बावली डीडीए के पास थी, उसके बाद वक्फ बोर्ड ने इसे अपनी संपत्ति माना, लेकिन इसे बचाने में किसी ने दिलचस्पी नहीं दिखाई। नतीजतन आसपास की गंदगी इस बावली में फेंकी जा रही है और अब यह अपनी अंतिम सांसें गिन रही है।
महरौली में ख्वाजा बख्तियार काकी की मजार पर रोज सैकड़ों लोग मत्था टेकने आते हैं, लेकिन यहां मौजूद बावली के बारे में कम ही लोगों को पता है। कुछ साल पहले तक इस बावली में पानी था, लेकिन अब यह पूरी तरह सूख चुकी है। फिलहाल यह बंद है और लोगों को इसके नीचे जाने की इजाजत नहीं है। करीब आठ साल पहले दिल्ली हाई कोर्ट में पेश की गई लिस्ट में डीडीए को इस बावली का केयरटेकर बताया गया था, लेकिन इसके एक साल बाद हाई कोर्ट में पेश की गई रिवाइज्ड लिस्ट में इस बावली को दिल्ली वक्फ बोर्ड की लिस्ट में दिखाया गया। सूत्रों का कहना है कि दरगाह से जुड़े सारे मसलों की देखरेख के लिए नियुक्त वक्फ बोर्ड की कमिटी भी मानती है कि लोगों ने इस बावली को कूड़ा फेंकने की जगह में तब्दील कर दिया है। कमिटी के मैनेजर फैजान अहमद मानते हैं कि इस बावली की साफ-सफाई की जिम्मेदारी कमिटी की है, लेकिन उनका कहना है कि अगर हम खुद यह काम करवाते हैं तो हमें आसपास के लोगों का विरोध झेलना पड़ सकता है। हम नहीं चाहते कि इस पवित्र जगह पर कोई ऐसी वैसी हरकत हो, इसलिए इसके लिए हम एमसीडी को कई बार पत्र लिख चुके हैं।
दिल्ली में जल सोतों को बचाने की मुहिम से लंबे समय से जुड़े विनोद जैन बताते हैं कि हाई कोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा था कि कोई भी जल सोत जैसे तालाब, झील, बावली आदि की सफाई की जिम्मेदारी उसी एजेंसी की होगी, जिसकी जमीन पर वह जल स्रोत मौजूद है। अगर कोई इसके पीछे अपनी मजबूरी बताता है, तो इसका मतलब यह हुआ कि वह अपनी जिम्मेदारी से बच रहा है। जल सोत से जुड़े इस पूरे मसले के लिए हाई कोर्ट ने एक मॉनिटरिंग कमिटी का गठन किया था और दिल्ली सरकार के चीफ सेक्रेटरी राकेश मेहता को इसका अध्यक्ष बनाया था। विनोद का कहना है कि अगर वक्फ बोर्ड वाकई इस बावली को बचाना चाहता है, तो वह इस बारे में दिल्ली सरकार के चीफ सेक्रेटरी से संपर्क क्यों नहीं करता। उनका कहना है कि दिल्ली के इन जल सोतों से जुड़ी एजेंसियां एक तरफ तो उन्हें अपने हाथ से खोना भी नहीं चाहतीं और दूसरी तरफ उनको बचाने की कोशिश भी नहीं करतीं।
मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने एक हफ्ते पहले ही इंटैक के एक कार्यक्रम में कहा था कि दिल्ली के जल सोत भी हमारी विरासत हैं और उन्हें भी ऐतिहासिक धरोहर के तौर पर देखा जाना चाहिए। दिल्ली में कुआं, तालाब, बावली समेत 629 जल सोत हैं। इनमें से 15 एएसआई के पास, डीडीए के पास 118, दिल्ली सरकार के पास 469 व सीपीडब्ल्यूडी और पीडब्ल्यूडी के पास 4-4 हैं।
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